पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(Shamku - Shtheevana)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

 

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Shamku -  Shankushiraa  ( words like Shakata/chariot, Shakuna/omens, Shakuni, Shakuntalaa, Shakti/power, Shakra, Shankara, Shanku, Shankukarna etc. )

Shankha - Shataakshi (Shankha, Shankhachooda, Shachi, Shanda, Shatadhanvaa, Shatarudriya etc.)

Shataananda - Shami (Shataananda, Shataaneeka, Shatru / enemy, Shatrughna, Shani / Saturn, Shantanu, Shabara, Shabari, Shama, Shami etc.)

Shameeka - Shareera ( Shameeka, Shambara, Shambhu, Shayana / sleeping, Shara, Sharada / winter, Sharabha, Shareera / body etc.)

Sharkaraa - Shaaka   (Sharkaraa / sugar, Sharmishthaa, Sharyaati, Shalya, Shava, Shasha, Shaaka etc.)

Shaakataayana - Shaalagraama (Shaakambhari, Shaakalya, Shaandili, Shaandilya, Shaanti / peace, Shaaradaa, Shaardoola, Shaalagraama etc.)

Shaalaa - Shilaa  (Shaalaa, Shaaligraama, Shaalmali, Shaalva, Shikhandi, Shipraa, Shibi, Shilaa / rock etc)sciple, Sheela, Shuka / parrot etc.)

Shilaada - Shiva  ( Shilpa, Shiva etc. )

Shivagana - Shuka (  Shivaraatri, Shivasharmaa, Shivaa, Shishupaala, Shishumaara, Shishya/de

Shukee - Shunahsakha  (  Shukra/venus, Shukla, Shuchi, Shuddhi, Shunah / dog, Shunahshepa etc.)

Shubha - Shrigaala ( Shubha / holy, Shumbha, Shuukara, Shoodra / Shuudra, Shuunya / Shoonya, Shoora, Shoorasena, Shuurpa, Shuurpanakhaa, Shuula, Shrigaala / jackal etc. )

Shrinkhali - Shmashaana ( Shringa / horn, Shringaar, Shringi, Shesha, Shaibyaa, Shaila / mountain, Shona, Shobhaa / beauty, Shaucha, Shmashaana etc. )

Shmashru - Shraanta  (Shyaamalaa, Shyena / hawk, Shraddhaa, Shravana, Shraaddha etc. )

Shraavana - Shrutaayudha  (Shraavana, Shree, Shreedaamaa, Shreedhara, Shreenivaasa, Shreemati, Shrutadeva etc.)

Shrutaartha - Shadaja (Shruti, Shwaana / dog, Shweta / white, Shwetadweepa etc.)

Shadaanana - Shtheevana (Shadaanana, Shadgarbha, Shashthi, Shodasha, Shodashi etc.)

 

 

शूर्प

दर्शपूर्णमासयागस्य संदर्भे शतपथब्राह्मणे १.१.१.२२ येषां दशसंख्यकानां द्वन्द्वानां गणना अस्ति, तेषु शूर्पं अग्निहोत्रहवणी प्रथमं द्वन्द्वं अस्ति। दर्शपूर्णमासयागे प्रथमतः धान्यपूर्णा एका अनः/शकटः यागस्थले आयाति। तामारोहयित्वा तां मित्रस्य चक्षुषा पश्यन्ति। तस्मात् धान्यराशितः अग्निहोत्रहवणी संज्ञके पात्रे धान्यं गृह्णन्ति। तस्य धान्यस्य स्थांतरणं शूर्पे कृत्वा शूर्पतः उलूखलमुसलादिषु कुर्वन्ति। पुनः तं धान्यं शूर्पे गृहीत्वा तस्य निष्तुषीकरणं कुर्वन्ति। तै.ब्रा. १.६.५.४ अनुसारेण निष्तुषीकरणं वरुणस्य राज्ञस्य अवभृथकृत्यसमानं अस्ति। अयं संकेतमस्ति यत् यदा धान्यस्य अग्निहोत्रहवण्यां ग्रहणं कुर्वन्ति, तत् कृत्यं मित्रदेवताकः कृत्यमस्ति। अग्निहोत्रहवणी किं अस्ति। अयं प्रतीयते यत् अग्निहोत्रकृत्येन यस्याः अग्नेः प्राप्तिः भवति, तस्य संज्ञा अग्निहोत्रहवणी अस्ति। अग्निहोत्रे प्रातः उच्चार्यन्ते सूर्यः ज्योतिः ज्योतिस्सूर्यः स्वाहा(उच्चस्वरेण)। अग्निर्ज्योतिः ज्योतिरग्निः स्वाहा(उपांशु)। सायंकाले अग्निर्ज्योतिः ज्योतिरग्निः स्वाहा (उच्चस्वरेण)। सूर्यः ज्योतिः ज्योतिस्सूर्यः स्वाहा (उपांशु)। द्र. अग्निहोत्रोपरि टिप्पणी। अग्निहोत्रस्य किमुद्देश्यं अस्ति। वैदिकवाङ्मये कथनमस्ति यत् पृथिव्याः ज्योतिः अग्निरस्ति, अन्तरिक्षस्य वायुः, द्युलोकस्य सूर्यः, नक्षत्राणां चन्द्रमा, अपसां विद्युत्। पृथिव्याः ज्योतिरूपेण या अग्निरस्ति, तत् सधूमं अथवा निर्धूमं भवितुं शक्यते। अग्निहोत्रकृत्यस्य उद्देश्यं निर्धूमस्य अग्नेः, ज्योतियुक्तस्य अग्नेः प्राप्तिः अस्ति। कथनमस्ति यत् या पृथिव्याः ज्योतिः अस्ति, यस्य संज्ञा अग्निरस्ति, तस्य व्याकृतं रूपं वाक् अस्ति। अयं वाक् सत्य वाक्, सरस्वती, वेदानां वाक्, वरदान-शापदानसमर्था वाक् भवितुं शक्यते। अतएव, यदा दर्शपूर्णमासे अग्निहोत्रहवण्याः उल्लेखं भवति, तस्मात् अस्यैव वाचः अभिप्रायं अस्ति, एवं कथितुं शक्यन्ते। अग्निहोत्रहवण्याः न्यासं मुखोपरि भवति, शूर्पस्य पादौ।

     दर्शपूर्णमासयागस्य संदर्भे कथनमस्ति यत् दर्शकाले वाक् ददृश-इव भवति। या वाक् अव्यक्ता आसीत्, सा किंचित् दृश्या भवति।   दर्शपूर्णयागस्य परिणतिः अर्क-अश्वमेधे भवति। अग्नेः यः ज्योतियुक्तरूपमस्ति, तस्य संज्ञा अर्कः अस्ति, अयं प्रतीयते। चक्षु, श्रोत्रादि अर्कस्य अंशाः सन्ति। तेषु ज्योतिः विद्यमाना अस्ति। यः पूर्णमासः अस्ति,  तत् अश्वस्य रूपं गृह्णाति। अस्य अश्वस्य शिरः उषा, ज्योतिरूपः अस्ति। सार्वत्रिकरूपेण कथनमस्ति यत् पूर्णमासः मनसः प्रतीकमस्ति। अपि च, यथा अश्वमेधस्य टिप्पण्यां कथितमस्ति, अश्वमेधे यस्य अश्वस्य प्रयोगं भवति, तत् प्रवर्ग्यस्य प्रतीकं अस्ति, अयं प्रतीयते। प्रवर्ग्यकृत्यस्य उद्देश्यं या प्रजा शिरोविहीना अस्ति, या अनुशासनरहिता, राजारहिता अस्ति, ताभ्यः शिरस्य सृजनमस्ति। किं मनः प्रजानां (वाचः, प्राणः) शासनं कर्तुं शक्यते। अस्मिन् संदर्भे अयं उल्लेखनीयमस्ति यत् अयं मनः ज्योतिरूपः चन्द्रमा अस्ति।  यावत् अग्निहोत्रमस्ति, तावत् केवलं वाक् प्राणयोः अथवा पृथिवी- सूर्ययोः अस्तित्वं अस्ति। कथनमस्ति यत् अग्निहोत्रे मनसः अस्तित्वं अग्नेः धूम्ररूपेणेव अस्ति। यदा दर्शपूर्णमासस्य आविर्भावं भवति, तदा मनसः अस्तित्वं अपि प्रकाशते। यागे अस्य सर्जनं पुरोडाशरूपेण, यः मस्तिष्कस्य प्रतीकमस्ति, भवति।

            शूर्पस्य निर्माणं इषीकाभिः अथवा नडःभिः करणस्य निर्देशमस्ति। यदा शूर्पेण धान्यस्य निष्तुषीकरणं भवति, तदा जपनीयः मन्त्रः अस्ति वर्षवृद्धमसि इति। अत्र कथनमस्ति यत् शूर्पस्य निर्माणं याभिः इषीकाभिः भवति, ता इषीकाः अपि वर्षवृद्धाः भवन्ति। धान्यमपि वर्षवृद्धः अस्ति। अनेन कारणेन तेषां साहचर्यं भवति एवं शूर्पः धान्यस्य निष्तुषीकरणे समर्थः भवति। किन्तु अयं कथनं रहस्योद्घाटनं न करोति। इषीकायाः संदर्भे कथनमस्ति यत् मुञ्जतः इषीकायाः विलगनं एवंप्रकारेण कुर्वन्ति यथा अहिः त्वचं मुञ्चति। इषीकाशब्दोपरि टिप्पणी पठनीया अस्ति। धान्योपरि यः तुषः विद्यमानः अस्ति, तत् अचेतनमनसः प्रतीकं भवितुं शक्यते। यदा मन-प्राण-वाक् रूपेण संवत्सरस्य निर्माणं भविष्यति, तदैव तुषरूपाणां पापानां नाशं भविष्यति।

     अग्निहोत्रे हविर्द्रव्यं गोपयः भवति। यथा अग्निहोत्रशब्दस्य टिप्पण्यां कथितमस्ति, पयः बन्धनमुक्तायाः, पाशरहितायाः अवस्थायाः प्रतीकमस्ति। दर्शपूर्णमासे ये आवरकाः पापाः सन्ति, तेषां अपनयनस्य प्रयासमपि भवति।

वाक् उपरि टिप्पणी

 

शूर्पणखा की कथा के माध्यम से आत्मज्ञान के समक्ष देहासक्ति के प्रभावहीन होने का चित्रण

 - राधा गुप्ता

अरण्यकाण्ड (अध्याय १७ से ३०) में वर्णित शूर्पणखा की कथा का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है -

कथा का संक्षिप्त स्वरूप

     अगस्त्य मुनि ने राम को जब पञ्चवटी में रहने का परामर्श दिया, तब राम, लक्ष्मण और सीता के साथ पञ्चवटी के रमणीय प्रदेश में आ गए और लक्ष्मण द्वारा निर्मित पर्णशाला में सुखपूर्वक रहने लगे। पञ्चवटी के निकट ही गोदावरी नदी बहती थी, जिसमें स्नान करके राम, लक्ष्मण और सीता के साथ बहुत सुख पाते थे। एक दिन परस्पर बातचीत में लगे हुए राम के पास अकस्मात् एक राक्षसी आई जो रावण नामक राक्षस की बहिन शूर्पणखा थी। राम को देखते ही वह राक्षसी काम से मोहित हो गई और राम से पञ्चवटी में आगमन का प्रयोजन पूछने लगी। राम ने कहा कि वे दशरथ के पुत्र हैं और धर्मरक्षा के उद्देश्य से भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ इस वन में निवास करने के लिए आए हैं। राम द्वारा राक्षसी का परिचय पूछने पर राक्षसी ने कहा कि वह इच्छानुसार रूप धारण करने वाली, रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर तथा दूषण की बहन शूर्पणखा है र समस्त प्राणियों के मन में भय उत्पन्न करती हुई इस वन में अकेली विचरती है।

     शूर्पणखा ने राम को अपना पति बनाना चाहा परन्तु राम ने परिहासपूर्वक लक्ष्मण को ही पति बनाने का परामर्श दिया। शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गई परन्तु लक्ष्मण ने भी जब उसे पुनः राम के पास भेज दिया, तब वह क्रोध से भरकर सीता को खा जाने के लिए उद्त हुई। राम ने शूर्पणखा को विरूप करने के लिए तुरन्त लक्ष्मण को आज्ञा दी। तदनुसार लक्ष्मण ने तलवार निकालकर शूर्पणखा के नाक-कान काट लिए। नाक - कान कट जाने पर शूर्पणखा जोर से चिल्लाती हुई वन के भीतर भाग गई और जनस्थान - निवासी अपने भाई खर के पास पहुँची। शूर्पणखा के विरूप होने का समस्त वृत्तान्त जानकर खर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने राम के वध के लिए चौदह राक्षसों को भेजा। राम ने सभी चौदह राक्षसों का जब वध कर दिया, तब शूर्पणखा की ललकार से उत्तेजित हुए खर तथा दूषण ने चौदह हजार राक्षसों की सेना के साथ पञ्चवटी में आकर राम के साथ युद्ध किया परन्तु राम ने अकेले ही समस्त सेना के साथ खर तथा दूषण का वध कर दिया।

कथा की प्रतीकात्मकता

कथा प्रतीकात्मक है । अतः पहले सभी प्रतीकों को समझ लेना आवश्यक है।

१- पञ्चवटी - पञ्चवटी शब्द पञ्च और वटी नामक दो शब्दों के मेल से बना है। पञ्च का अर्थ है - पाँच जो पाँ ज्ञानेन्द्रियों तथा पाँच कर्मेन्द्रियों को इंगित करता प्रतीत होता है। वटी(घेरना अर्थ वाली वट् धातु से निर्मित) का अर्थ है - घेरा, बाडा, स्थान, वाटी अथवा वाटिका। अतः पञ्चवटी का अर्थ हुआ - पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा पाँच कर्मेन्द्रियों का घेरा या बाडा या स्थान। मनुष्य के जीवन का सारा व्यापार(व्यवहार) इन्हीं इन्द्रियों के माध्यम से सम्पन्न हो रहा है, इसलिए पञ्चवटी को व्यवहार क्षेत्र कहा जा सकता है। राम का पञ्चवटी में आगमन यह संकेतित करता है कि आत्मज्ञान अब केवल मन (सोच) तक सीमित नहीं रहा। वह मन (सोच) के स्तर से व्यवहार के स्तर पर उतर गया है।

२- पर्णशाला - पर्णशाला शब्द वास्तव में पणशाला शब्द का ही छिपा हुआ स्वरूप है। पण का अर्थ है  - व्यापार, व्यवहार या लेनदेन। अतः पणशाला का अर्थ हुआ - वह स्थान या शाला जहाँ से व्यापार या लेनदेन हो रहा है। चूंकि सम्बन्ध - सम्पर्क में आने पर सारा लेनदेन (व्यवहार) मन (लक्ष्मण) के द्वारा सम्पन्न हो रहा है, इसलिए कथा में पञ्चवटी के भीतर लक्ष्मण द्वारा पर्णशाला के निर्माण को दर्शाया गया है।

३- पञ्चवटी के समीप गोदावरी नदी का प्रवाहित होना - गोदावरी शब्द गो, दा तथा वरी नामक तीन शब्दों के मेल से बना है। गो का अर्थ है - चेतना, दा का अर्थ है - दान तथा वरी का अर्थ है - श्रेष्ठ। अतः गोदावरी का अर्थ हुआ - चेतना के दान का श्रेष्ठ स्थान। पञ्चवटी के निकट गोदावरी का बहना कहकर यह संकेतित किया गया है कि इन्द्रियाँ ही चेतना के दान का (बहने का) श्रेष्ठ स्थान हैं अर्थात् इन्द्रियों के माध्यम से चेतना का दान सतत् हो रहा है।

४- शूर्पणखा - शूर्पणखा शब्द शूर्प तथा नखा नामक दो शब्दों के मेल से बना है। शूर्प का सामान्य अर्थ है - सूपडा या छा जो अनाज को साफ करने के काम आता है। परन्तु यह सूपडा अनाज को स्वयं साफ नहीं कर सकता। यह केवल एक यन्त्र है। अनाज की सफाई तभी हो सकती है जब कोई अन्य उस यन्त्र (सूपडे) को हाथ में लेकर उसका समुचित उपयोग करे। मनुष्य को प्राप्त शरीर भी सूपडे के समान एक यन्त्र ही है, जिसका समुचित उपयोग तभी किया जा सकता है जब मनुष्य स्वयं को शरीर रूपी यन्त्र से अलग, शरीर का उपयोग करने वाली एक शक्ति, एक आत्मा समझे। परन्तु स्वयं को भूलकर जब मनुष्य शरीर रूपी यन्त्र को ही अपना आप (अर्थात् यह शरीर ही मैं हूँ) समझ बैठता है, तब वह समझ खण्डित समझ कही जाती है। अध्यात्म के क्षेत्र में यही खण्डित समझ शरीर चेतना कहलाती है और पुराणों ने इसे ही दिति नाम दिया है जिससे दैत्य उत्पन्न होते हैं। वेदों में इसी दिति को शूर्प कहा गया है। यथा - दितिः शूर्पम् अदितिः शूर्पग्राही अर्थात् दिति शूर्प(सूपडा) है और अदिति उस शूर्प को ग्रहण करने वाली है। इस प्रकार शूर्पणखा शब्द में शूर्प शब्द शरीर चेतना अर्थात् मैं शरीर हूँ  - इस खण्डित समझ को संकेतित करता है।

                नखा शब्द नहा शब्द का तद्भव(बिगडा ) स्वरूप है और बांधना अर्थ वाली नह् धातु से बना है। अतः शूर्पणखा या शूर्पनहा का अर्थ हुआ - बाँधने वाली शरीर चेतना। शरीर चेतना ही मनुष्य को बाँधती है क्योंकि अब मनुष्य स्वयं को शरीर समझकर पहले शरीर में आसक्त होता है और फिर शरीर के आधार पर निर्मित हुई अपनी समस्त भूमिकाओं को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझकर उनमें अत्यन्त आसक्त हो जाता है। अतः बाँधने वाली शरीर चेतना अथवा देहासक्ति को ही शूर्पणखा कहा जा सकता है।

                चूंकि देहासक्ति ही धीरे - धीरे अन्य आसक्तियों (धन - वैभव में आसक्ति, सुखों में आसक्ति आदि) के रूप में प्रकट होती है, इसलिए कथा में शूर्पणखा  को इच्छानुसार रूप धारण करने वाली कहा गया है।

                देहासक्ति एक नकारात्मक भाव है, इसलिए इसे राक्षसी कहना उचित ही है। देहाभिमान (रावण) की स्थिति में देहासक्ति भी निश्चित रूप से रहती ही है, इसलिए इसे कथा में रावण की बहिन कहकर संकेतित किया गया है।

५ - शूर्पणखा का दण्डकारण्य में विचरना - शूर्पणखा का दण्डकारण्य में विचरना कहकर संकेत किया गया है कि समस्त विचार और भाव चाहे वे सकारात्मक हों अथवा नकारात्मक - सदैव मन में विद्यमान होते हैं, सम्बन्धों में नहीं। सम्बन्धों में इनका प्राकट्य केवल तब ही होता है जब वे मन के धरातल पर विद्यमान होते हैं। देहासक्ति भी संस्कार रूप (बीज रूप ) होकर मन की गहराई में पडी रहती है और वहीं से निकलकर सम्बन्ध - सम्पर्क में प्रकट होती रहती है।

६ - शूर्पणखा द्वारा सीता को खाने के लिए उद्धत होना - यहाँ यह संकेत किया गया है कि देहासक्ति के फलस्वरूप ही मनुष्य के भीतर मैं - मेरा और स्वार्थ के विचार, प्रतिस्पर्धा -प्रतियोगिता - प्रतिद्वन्द्विता के विचार तथा राग - द्वेष - ईर्ष्या आदि के विचार उपस्थित हो जाते हैं जो मनुष्य की पवित्रता, शुचिता (सीता) को निगल जाने के लिए सदैव उद्त रहते हैं।

७ - लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के नाक - कान का छेदन - यहाँ यह संकेत किया गया है कि आत्मज्ञानी मनुष्य अपने ज्ञानयुक्त मन (लक्ष्मण) के सहारे अकस्मात् उपस्थित हुई आसक्ति को इतना प्रभावहीन बना देता है कि वह आसक्ति निर्बल होकर जहाँ से आई थी, वहीं वापस लौट जाती है। आसक्ति का प्रभावहीन हो जाना ही उसके नाक - कान को काटना है।

८- राम द्वारा जनस्थान में रहने वाले खर और दूषण का सेना सहित विनाश - जनस्थान शब्द सामान्य मनुष्य के ऐसे मन को इंगित करता है जिसमें मैं और मेरा के रूप में कठोर, दुष्ट सोच सदैव विद्यमान रहती है। मैं और मेरा के रूप में यह कर्कश, दुष्ट सोच मन के भीतर तभी तक फलती - फूलती है जब तक मनुष्य को स्वस्वरूप का ज्ञान (आत्मज्ञान) नहीं हो जाता। स्वस्वरूप में स्थित होकर सभी के प्रति आत्मदृष्टि हो जाने पर यह सोच सहजता से विनष्ट हो जाती है, जिसे कथा में राम द्वारा खर तथा दूषण के वध के रूप में इंगित किया गया है।

                कथा में खर की सेना को संख्या की दृष्टि से चौदह और चौदह सहस्र कहकर यह संकेतित किया गया है कि मैं और मेरा की कठोर दुष्ट सोच व्यक्तित्व पर इतना व्यापक प्रभाव डालती है कि वह सोच केवल मन तक सीमित नहीं रह पाती अपितु व्यक्तित्व के सभी चौदहों स्तरों - दसों इन्द्रियों तथा मन - बुद्धि - चित्त - अहंकार - पर भी फैल जाती है।

९ - धर्मरक्षा के उद्देश्य से राम का वन में आगमन - धर्मरक्षा का अर्थ है - आत्मा के धर्म की रक्षा अर्थात् प्रत्येक आत्मा (मनुष्य) सुख - शान्ति - शक्ति - शुद्धता  - ज्ञान - प्रेम तथा आनन्द के रूप में जिन गुणों (धर्मों) को धारण करता है, उन सब गुणों की जीवन में स्थापना करना। मनुष्य के जीवन का उद्देश्य भी यही है। परन्तु यह उद्देश्य केवल तभी पूरा हो सकता है जब मनुष्य आत्मज्ञान में स्थित होकर व्यवहार क्षेत्र में उतरे। अर्थात् स्वयं को तो आत्मरूप जाने ही, दूसरों को भी आत्मा जानकर तदनुसार जीवन में व्यवहार करे। तब ही नए विकार निर्मित नहीं होते और मन की गहराई(चित्त) में पडे हुए पुराने विकार बाहर आ - आकर निष्प्रभावी हो जाते हैं।

कथा का अभिप्राय

प्रस्तुत कथा आसक्ति से सम्बन्धित अनेक तथ्यों को निम्न रूप में प्रकट करती है -

१ - अपने वास्तविक स्वरूप - आत्मस्वरूप (मैं अजर - अमर - अविनाशी चैतन्यशक्ति आत्मा हूँ) को भूल जाने के कारण जब मनुष्य स्वयं को शरीर मात्र ही समझने लगता है, तब वह न केवल शरीर के प्रति आसक्त हो जाता है, अपितु शरीर से सम्बन्ध रखने वाली अपनी भूमिकाओं से भी आसक्त हो जाता है। इसी आसक्ति को कथा में शूर्पणखा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

२ - मनुष्य एक शरीर छोडता है तथा दूसरा ग्रहण करता है। इस एक शरीर को छोडने तथा दूसरा शरीर ग्रहण करने की लम्बी यात्रा में यह सक्ति एक संस्कार बनकर चित्त(मन की गहराई) में चली जाती है, जिसे कथा में शूर्पणखा का दण्डकारण्य में विचरना कहकर इंगित किया गया है।

३- व्यवहार क्षेत्र अर्थात् सम्बन्ध - सम्पर्क में आने पर वही आसक्ति चित्त से निकलकर बाहर (मन के धरातल पर) आती है और प्रत्येक मनुष्य को अपने वश में कर लेती है। प्रस्तुत कथा के माध्यम से यह महत्त्वपूर्ण संकेत किया गया है कि जब तक मनुष्य को स्वस्वरूप - आत्मस्वरूप का ज्ञान नहीं हुआ है और वह स्वयं को तथा दूसरों को भी शरीर समझकर जी रहा है, तभी तक वह इस आसक्ति के वशीभूत होता है। स्वयं को आत्मरूप र दूसरों को भी आत्मरूप में देखने पर मनुष्य कभी भी आसक्ति के वशीभूत नहीं होता। अतः आसक्ति प्रभावहीन होकर जैसे आती है, वैसे ही लौट भी जाती है, जिसे कथा में शूर्पणखा का विरूप होकर पुनः वन (दण्डकारण्य) में भाग जाना कहा गया है।

४ - यहाँ यह संकेत भी किया गया है कि यह आसक्ति जब एक सामान्य (आत्म ज्ञान से रहित अथवा अज्ञानी) मनुष्य को अपने वश में करती है, तब नित्य नया स्वरूप धारण करने के कारण सुन्दर बनी रहती है और मनुष्य को यह पता भी नहीं चल पाता कि सके दुःखों का कारण नए - नए स्वरूपों में आने वाली आसक्ति ही है। परन्तु आत्मज्ञानी के वशीभूत हुई यही आसक्ति न केवल नित्य - नूतन स्वरूप धारण करने से वंचित हो जाती है, अपितु अपने प्रभाव को भी खो देती है। आसक्ति की इस प्रभावहीनता को ही कथा में शूर्पणखा के नाक - कान का छेदन कहकर इंगित किया गया है।

५- आसक्ति एक ऐसा विकार है जिसके कारण मनुष्य की सोच में मैं और मेरा जैसे दुष्ट विचार सहस्रों अन्य व्यर्थ विचारों के साथ भरे रहते हैं और प्रबल भी बने रहते हैं। परन्तु आत्मज्ञान के द्वारा आसक्ति के प्रभावहीन अथवा निर्बल हो जाने पर वे सब विचार भी अधिक समय तक टिक नहीं पाते और विनष्ट हो जाते हैं। इसे ही कथा में राम के द्वारा जनस्थान - निवासी खरदूषण का सेना सहित विनष्ट हो जाना कहा गया है।

(प्रथम लेखन -- २२ - ८ - २०१४ई.(भाद्रपद कृष्ण द्वादशी, विक्रम संवत् २०७१)

Self Knowledge makes attachment inactive as described in the story of Shoorpanakhaa

- Radha Gupta

In Aranya kanda (chapter १७ to ३०) there is a story of demoness Shoorpanakhaa> It is said that Shoorpanakhaa suddenly appeared before Rama while he was sitting comfortable with Lakshmana and Sita. Shoorpanakhaa introduced herself as a demoness wandering in Dandakaranya and a sister of Ravana, Kumbhakarna, Vibheeshana, Khara and Dushana> Se expressed her wish to marry him but Rama jokingly told her to approach Lakshmana for this> When Lakshmana sent her back to Rama, she got angry and ran towards Sita to devour her. Rama immediately ordered Lakshmana to make the demoness ugly. Hence, Lakshmana cut off her nose and ears. She started crying and went back to Dandakarnya first and then to Janasthana where her brothers Khara and Dushana were living. Hearing the whole incidence from her, Khara and Dushana got infuriated and moved to fight Rama. But Rama killed them along with their huge army.

                                       The story is symbolic and describes many aspects related to attachment.

. When a person forgets his own real Self and thinks himself a body, he gets attached first to the body and then to his roles. This attachment is symbolized as demoness Shoorpanakhaa in the story.

. In the long journey of birth and death, this attachment gets converted into sanskara which lies in sub - conscious mind and suddenly gets emerged when a person with Self Knowledge comes into interaction. This is symbolized as coming of Shoorpanakhaa in Panchavati from Dandakaaranya.

. Attachment is a powerful vice. An ignorant person easily gets affected and entangled into it but a person who knows his own real Self never gets affected and entangled. Attachment comes and tries it's best to possess him and to overpower him but becomes powerless before him. This is symbolized as approaching of Shoorpanakhaa in front of Rama but goes back in Dandakaaranya after loosing her nose and ears.

. Attachment is so powerful that if not handled properly, it tries to attack on one's purity. This is symbolized as an effort of Shoorpanakhaa to devour Sita.

. Attachment is closely related to ego symbolized as Shoorpanakhaa - sister of Ravana. Therefore a person who knows his own Real Self and is the controller of his own thoughts, controls it upto the stage till ego comes to an end.

. Attachment is a strong vice which first brings the though of Me and Mine and then this Me and Mine produces a lot of negative thoughts. A person knowing his own Real Self is alone capable to destroy this Me and Mine with all these negative thoughts. This is symbolized as the killing of Khara and Dushana along with their huge army by Rama.

 

 

शूर्पणखा का वैदिक पक्ष

- विपिन कुमार

राधा ने शूर्पणखा के विषय में जो निष्कर्ष प्रस्तुत किया है, वह यह है कि शूर्पणखा आसक्ति है जिसको आत्मज्ञान के द्वारा नष्ट किया जा सकता है। इस विचार की पुष्टि पुराणों के इस कथन से होती है कि राम अवतार के समय जो शूर्पणखा थी, वह कृष्ण अवतार के समय कुब्जा बनी जिसने कृष्ण को अंगराग अर्पित किया। कृष्ण ने उसके कुब्जत्व को दूर करके उसे समंगा बना दिया। यहां अंगराग से तात्पर्य आसक्ति से ही लिया जाना चाहिए। पुराणों में उल्लेख आता है कि शूर्पणखा के पति का नाम विद्युज्जिह्व था जिसे रावण ने मार दिया था। योग में दो जिह्वाओं का उल्लेख आता है - शिश्न निचले स्तर की जिह्वा है जबकि रसना उपर के स्तर की। विद्युत तो दोनों में ही विद्यमान है। अपेक्षा की जाती है कि निचले स्तर की जिह्वा को सक्रिय नहीं होने दिया जाएगा। और ऊपर के स्तर की जिह्वा को भी सक्रिय होने देने की कितनी अनुमति है, यह अन्वेषणीय है। निचले स्तर की जिह्वा और अंगराग में घनिष्ठ संबंध है। निचले स्तर की जिह्वा के सक्रिय होने पर अंगराग का स्वरूप सारे अंगों में विद्यमान कामुकता हो सकता है। पादल आदि में खुजलाने से जो गुदगुदी उठती है, उसका कारण भी शिश्न की विद्युत को माना जाता है। अतः यदि शिश्न की विद्युत को निष्प्रभावी बना दिया जाए तो पादतल आदि की गुदगुदी भी समाप्त हो सकती है। इस गुदगुदी को अंगराग(सामान्य भाषा में चन्दन) कहा जा सकता है जिसे कुब्जा ने कृष्ण को अर्पित कर दिया था। कृष्ण को अर्पित करने का क्या अर्थ हो सकता है, यह अन्वेषणीय है। कृष्ण का अर्थ है जो कर्षण कर सकता है, इन्द्रियों को उनके विषयों से अलग कर सकता है, अथवा जो सूर्य की रश्मियों का कर्षण कर सकता है आदि। साधारण भाषा में तो रामचरितमानस सुन्दरकाण्ड ४७.५ की चौपाई को दोहरा दिया जाता है कि  - सबकी ममता ताग बटोरी । मम पद मनहिं बांधि बरि डोरी।। अंगराग का वैदिक स्वरूप यह हो सकता है कि कौशिक पद्धति ८.२.६१.१८ में शूर्प के अधोभाग का गोमय से लेपन करने का विधान है। लेपन करते समय जिस मन्त्र(यत्त्वा शिक्वः परावधीत् इति) का जप किया जाता है वह यह है कि हे वृक्ष, यूप बनाने के लिए तक्षा ने तेरे जिस भाग की हिंसा की है, उसकी पूर्ति जीवन देने वाले आपः करें और तुझे पवित्रता प्रदान करें इत्यादि। गोमय के उल्लेख से यह भी संकेत मिलता है कि शूर्प को गोमय, सूर्य की किरणों को ग्रहण करने में समर्थ होना चाहिए। वैदिक साहित्य तो शूर्प के अवयवों के वर्षवृद्ध होने की बात करता है। शूर्प के तीन अवयवों का उल्लेख है - वेणु, नड या इषीका। इन्हें वर्षा द्वारा वर्धित होना चाहिए। तभी यह शूर्प में डाली जाने वाली हवि के गुणों को परख सकते हैं। हवि स्वयं वर्षवृद्ध है। यह कथन शूर्प को समझने की कुंजी कहा जा सकता है। वर्षा से तात्पर्य दिव्य जल की वर्षा से है। लोक में कहा जाता है कि ईश्वर की कृपा तो लगातार बरस रही है, बस हमें पहचान होनी चाहिए। योग की भाषा में इसे इस प्रकार कहा जा सकता है कि मनुष्य को ब्रह्माण्ड से दिव्य जल को आकर्षित करने का लगातार प्रयत्न करते रहना चाहिए। मनुष्य नर या नड में आता है। पुराणों में राजा नल को जो वरदान मिले थे, उनमें से एक वरदान यह था कि तुम जहां चाहोगे, वहीं जल प्रकट हो जाएगा। इसीलिए अपने अज्ञातवास में राजा नल रसोईया (सूद) बना था। लक्ष्मीनारायण संहिता में जहां लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के नाक कान काटने का उल्लेख है, वहां लक्ष्मण नाम न लेकर नरादित्य नाम लिया गया है। वैदिक साहित्य के आदित्य की विशेषता भी यही है कि वह अपनी किरणों के माध्यम से ब्रह्माण्ड के जलों का कर्षण कर लेता है।  शूर्प द्वारा धान्य के तथाकथित अनुपयोगी भाग तुष आदि को हटाना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उसका जीवनदायक शक्तियों से, आपः से प्रतिस्थापन भी करना है, ऐसा मन्त्र का कथन है। यदि शूर्पणखा शब्द की निरुक्ति शूर्प णहा के रूप में करने का प्रयत्न किया जाए तो कहना होगा कि शूर्प के अवयवों वेणु, नड, इषीका आदि को परस्पर बांधने वाली शक्ति का नाम शूर्पणखा है। अथवा यह अर्थ भी किया जा सकता है कि जो शूर्प, साफ करने की, सत्य अनृत का विवेक करने की शक्ति है, उसको आच्छादित करने वाली शक्ति शूर्पणखा है। जब लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की नाक काट लेने का उल्लेख आता है तो उसका सांकेतिक अर्थ यह है कि साधक अपने श्वास प्रश्वास के माध्यम से दिव्य आपः को ग्रहण करने लगा है। कहा जाता है कि जब बाहर जाने वाला श्वास भी  आनन्द देने लगे, अन्दर जाने वाला श्वास भी, तब सिद्धि समझ लेनी चाहिए।

शूर्प का कार्य धान्य से फल और तुष को अलग - अलग कर देना होता है। व्यवहार में तो धान्य को शूर्प या छाज में डालकर उसे ऊपर - नीचे किया जाता है जिसे लौकिक भाषा में पिछोडना कहते हैं। शूर्प के सिद्धान्त के अनुसार शूर्प ऐसा होना चाहिए कि धान्य उसमें रखते ही वह अपने आप तुष से रहित हो जाए, पिछोडने की आवश्यकता न पडे। अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास आदि हविर्यज्ञों में धान्य को एक शकट में ढोकर लाया जाता है। उस शकट पर चढकर धान्य को मित्र की दृष्टि से निहारा जाता है। फिर मुट्ठी में भरकर उसे अग्निहोत्रहवणी नामक पात्र में डाला जाता है और फिर अग्निहोत्रहवणी से  उसे शूर्प में डाला जाता है। शूर्प से उलूखल में। उलूखल में कूटने के बाद पुनः शूर्प में इत्यादि। शूर्प का कार्य वरुण का, पुण्य और पापों को अलग अलग करने का, सत्यानृत विवेक का है। व्यवहार में हमारी अपनी देह को ही एक शूर्प माना जा सकता है। इस देह में हम अपने भोजन के रूप में जो भी अन्न डालते हैं, हमारी देह उस अन्न का शोधन करती है। व्यवहार में तो अन्न का शोधन जठर से आरम्भ होता है, लेकिन जठराग्नि द्वारा पाचित अन्न का सूक्ष्मीकरण पादतल से आरम्भ होता है। सूक्ष्म होता हुआ, शुद्ध होता हुआ अन्न का भाग पादतल से ऊपर की ओर गति करता जाता है। अथर्ववेद २०.१३६.९ (महानग्न्युप ब्रूते स्वसावेशितं पसः । इत्थं फलस्य वृक्षस्य शूर्पे शूर्पं भजेमहि ॥९॥ ) से इस कल्पना की पुष्टि होती प्रतीत होती है। इस मन्त्र में शूर्प में शूर्प का उल्लेख है। इसका अर्थ यह हुआ कि शूर्प कोई एक शूर्प नहीं है, अपितु विभिन्न स्तरों पर विभिन्न शूर्प, शोधन के तन्त्र कार्य कर रहे हैं।

     आहिताग्नि(जिस व्यक्ति ने अपनी चेतना को अग्नि की भांति दिनरात अनवरत् जलाए रखा हो) व्यक्ति की चिता में उसके अंगों पर विभिन्न यज्ञपात्रों की स्थापना की जाती है। शतपथ ब्राह्मण आदि में पार्श्वों में शूर्प रखने का निर्देश है जबकि कुछ अन्य ग्रन्थों में पादों पर। लौकिक शूर्प के आकार से ऐसा प्रतीत होता है कि शूर्प का आकार पाद से मिलता है। कहा भी जाता है कि पादों को शूर्प की भांति उठे हुए होना चाहिए।

                      शूर्प और शूर्पणखा में क्या सम्बन्ध हो सकता है, इसका अनुमान इस प्रकार लगाया जा सकता है कि आज भी तन्त्र में यह प्रचलित है कि तान्त्रिक को शरीर में जहां भी चक्रों के कारण बन्धन दिखाई देता है, उसे अंगुलि अग्रों द्वारा प्रेरित करके दूर किया जाता है। स्वर्गीय माता निर्मला देवी अपने शिष्यों को इस विद्या में पारंगत बनाती थी और शिष्य अंगुलियों की प्रेरणा से एक दूसरे के चक्रों की उलझनों को खोला करते थे। हो सकता है कि नखों का स्थान शूर्प के कार्य में विशेष दक्षता रखता हो। नख का अर्थ नासिका भी लिया जा सकता है। यद्यपि वाल्मीकि रामायण में लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के नाक - कान काटने का उल्लेख है, लेकिन अन्य ग्रन्थों में केवल नासिका छेदन का ही उल्लेख है। नख और नस शब्दों में समानता है। लक्ष्मण द्वारा नाक काटने के उल्लेख को इस प्रकार समझा जा सकता है कि नाक श्वास प्रश्वास ग्रहण करने का स्थान है। इस श्वास प्रश्वास द्वारा ही देह रूपी शूर्प में पडे अन्न की शुद्धि होती है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि सामान्य रूप में यह श्वास प्रश्वास शूर्प के कार्य में पूरा सफल नहीं हो पाता। देह में रोग उत्पन्न हो जाते हैं। अतः यह विचारणीय है कि क्या श्वास प्रश्वास का कोई उच्चतर रूप भी हो सकता है। एक उच्चतर रूप यह है कि जो भी वायु नाक के द्वारा शरीर में प्रवेश करेगी, नाक उसका विद्युतीकरण कर देगा, आधुनिक विज्ञान की भाषा में, वह वायु आक्सीजन के विद्युतकणों से युक्त होगी। यह विशिष्ट प्रकार की नाक बुद्ध पुरुषों की देह का एक लक्ष्म या लक्षण कहलाती है। लक्ष्म, लक्षण उत्पन्न होने की स्थिति को ही रामायण में लक्ष्मण कहा गया प्रतीत होता है।

पुराणों में शूर्पणखा के नाक - कान काटने पर बल दिया गया है इससे संकेत मिलता है कि देह रूपी शूर्प द्वारा शोधन में इन दो अवयवों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। नाक द्वारा तो हम मान सकते हैं कि नाक श्वास - प्रश्वास का स्थान है और नाक के कटने से देह रूपी शूर्प की शोधन प्रक्रिया पर सीधा प्रभाव पडेगा। लेकिन वाल्मीकि रामायण में नाक के साथ कान कटने का भी उल्लेख है। गणेश जी या हाथी को शूर्पकर्ण कहा जाता है। इससे संकेत मिलता है कि कर्ण का भी शोधन में महत्त्वपूर्ण योगदान है। डा. फतहसिंह कहा करते थे कि प्रकाश की दृष्टि से चक्षु और कर्ण परस्पर मिले हुए हैं। अतः जिस पुरुष या स्त्री के चक्षु कर्ण तक फैले होते हैं, उसे शुभ माना जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अतिरिक्त ऊर्जा का जो भाग सिर में पहुंचता है, उस अतिरिक्त ऊर्जा को शुद्ध करने में चक्षु व कर्ण की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। कर्ण केवल सुनने मात्र हेतु यन्त्र नहीं है।  यह अन्वेषणीय है कि शूर्पकर्ण गणेश के साथ किन कथाओं को जोडा गया है। ब्रह्माण्ड पुराण २.३.४२.३७ के अनुसार गणेश के शूर्पकर्ण नाम का कारण यह है कि सप्तर्षियों के शाप के कारण जातवेदा का क्षय हो गया था। शूर्पकर्ण गणेश में जातवेदा पुनः दीपित हो गई। इसका अर्थ यह लिया जा सकता है कि चक्षु, श्रोत्र आदि में कहा जाता है कि एक अपनी स्वयं की ज्योति है जो बाहर से उद्दीपन मिले बिना ही इन ज्ञानेन्द्रियों को सक्रिय बनाती है। यह स्वयं ज्योति निष्क्रिय बनी रहती है, किन्हीं विशेष परिस्थितियों में ही जाग्रत की जा सकती है। शूर्पकर्ण बनने की स्थिति में यह जातवेदा उद्दीपित रहती है।

         शूर्पणखा द्वारा हताश होने पर सीता का भक्षण करने के लिए दौडने का उल्लेख आता है। इस कथन को इस प्रकार समझा जा सकता है कि यदि हमारे शरीर की अतिरिक्त शक्ति का अधिकांश भाग अन्न रस का शोधन करने में लग जाएगा, शूर्पणखा प्रबल हो जाएगी तो सीता(खेत में हल से बनाई गई रेखा) जो बोए गए बीज को अंकुरित होने के लिए प्रेरित करती है, शक्ति देती है, वह अपने आप ही निष्क्रिय हो जाएगी। दूसरे शब्दों में ऐसा भी कहा जा सकता है कि यदि पाप रूपी बीजों को भूनने में सारी शक्ति लग गई तो फिर पुण्य रूपी बीजों को उगने के लिए शक्ति न मिल पाएगी। रामायण में तो राम शूर्पणखा को सपत्ना कहकर हास्य करते हैं लेकिन वास्तविक स्थिति यही है कि यह दोनों सपत्ना हैं।

     शतपथ ब्राह्मण में अग्निहोत्रहवणी व शूर्प दो पात्रों के युग्म का उल्लेख आता है जिसका निहितार्थ अन्वेषणीय है। अग्निहोत्रहवणी का मुख हंस प्रकार का व ओष्ठ हस्ती समान होते हैं। अग्निहोत्रहवणी में धान्य का ग्रहण करते समय कहा जाता है वानस्पत्यासि दक्षाय त्वा। शूर्प में धान्य का ग्रहण करते समय कहा जाता है वेषाय त्वा। यदि वेषाय से तात्पर्य विशः से है तो इस संदर्भ में इन्द्र द्वारा दिति के गर्भ का छेदन करके मरुतों को अपना मित्र बना लेने का उदाहरण दिया जा सकता है। जहां भी ऐसा लगे कि कोई प्राण हमारी चेतना से मित्रता नहीं रखता, हमसे शत्रुता रखता है, उसे कांटछांट कर अपने अनुकूल बनाना है।

     शूर्प का उल्लेख अथर्ववेद में तो आता है, लेकिन ऋग्वेद में प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं आता। यास्काचार्य (निरुक्तशास्त्रं ६.९ ) का कथन है स्यं शूर्पं स्यतेः। काशकृत्स्नधातुपाठ ९.१३२ में श्यम/स्यम धातु वितर्के अर्थ में है। निरुक्तशास्त्र के टीकाकार के अनुसार शूर्प का मूल षो (अन्तकर्मणि- काशकृत्स्न धातुपाठः ३.२१) धातु है। शूर्प धातु माने अर्थ में है(काश.धातुपाठः ९.१०४)

शौ.अ. ९.६.१६ का कथन है कि हविर्याग में जो शूर्प है, सोमयाग में उसका स्वरूप पवित्र हो जाता है।

प्रथम लेखन - ३१-८-२०१४(भाद्रपद शुक्ल षष्ठी, विक्रम संवत् २०७१)

संदर्भ

*ये व्रीहयो यवा निरुप्यन्तेऽंशव एव ते ॥१४॥ यान्युलूखलमुसलानि ग्रावाण एव ते ॥१५॥ शूर्पं पवित्रं तुषा ऋजीषाभिषवणीरापः ॥१६॥ स्रुग्दर्विर्नेक्षणमायवनं द्रोणकलशाः कुम्भ्यो वायव्यानि पात्राणीयमेव कृष्णाजिनम् ॥१७॥ - शौ.अ. ९.६.१७

उपरोक्त मन्त्र में सोमयाग में सोमलता से सोम प्राप्त करने के लिए जिस विधि को अपनाया जाता है तथा हविर्याग में धान्य से हवि प्राप्त करने के लिए जिस विधि को अपनाया जाता है, दोनों की तुलना की जा रही है।

*उलूखले मुसले यश्च चर्मणि यो वा शूर्पे तण्डुलः कणः । यं वा वातो मातरिश्वा पवमानो ममाथाग्निष्टद्धोता सुहुतं कृणोतु ॥२६॥ - शौ.अ. १०.९.२६

*तस्यौदनस्य बृहस्पतिः शिरो ब्रह्म मुखम् ॥१॥ द्यावापृथिवी श्रोत्रे सूर्याचन्द्रमसावक्षिणी सप्तऋषयः प्राणापानाः ॥२॥ चक्षुर्मुसलं काम उलूखलम् ॥३॥ दितिः शूर्पमदितिः शूर्पग्राही वातोऽपाविनक्॥४॥ अश्वाः कणा गावस्तण्डुला मशकास्तुषाः ॥५॥ कब्रु फलीकरणाः शरोऽभ्रम् ॥६॥ श्याममयोऽस्य मांसानि लोहितमस्य लोहितम् ॥७॥ त्रपु भस्म हरितं वर्णः पुष्करमस्य गन्धः ॥८॥ खलः पात्रं स्फ्यावंसावीषे अनूक्ये ॥९॥ आन्त्राणि जत्रवो गुदा वरत्राः ॥१०॥ इयमेव पृथिवी कुम्भी भवति राध्यमानस्यौदनस्य द्यौरपिधानम् ॥११॥ सीताः पर्शवः सिकता ऊबध्यम् ॥१२॥ - शौ.अ. ११.३.१२

उपरोक्त मन्त्र में दिति को शूर्प क्यों कहा गया है, इसका एक उत्तर यह हो सकता है कि शूर्प के अन्न से तुष को बाहर निकालने का कार्य वायु करती है। दिति ४९ मरुतों की माता है। अतः शूर्प को दिति कहा जा सकता है। हम सभी की देह एक शूर्प ही तो है। उस शूर्प की दक्षता में वैदिक साहित्य किस प्रकार सहायता कर सकता है, यह अन्वेषणीय है।

*विश्वव्यचा घृतपृष्ठो भविष्यन्त्सयोनिर्लोकमुप याह्येतम् । वर्षवृद्धमुप यच्छ शूर्पं तुषं पलावान् अप तद्विनक्तु ॥१९॥ - शौ.अ. १२.३.१९

*त्रयो लोकाः संमिता ब्राह्मणेन द्यौरेवासौ पृथिव्यन्तरिक्षम् । अंशून् गृभीत्वान्वारभेथामा प्यायन्तां पुनरा यन्तु शूर्पम् ॥शौ.अ. १२.३.२०

*महानग्न्युप ब्रूते स्वसावेशितं पसः । इत्थं फलस्य वृक्षस्य शूर्पे शूर्पं भजेमहि ॥९॥ - शौ.अ. २०.१३६.
( तु. महानग्न्युप ब्रूते स्वस्त्यावेशितं पसः इत्थं फलस्य वृक्षस्य शूर्पं शूर्पं भजेमहि  शां.श्रौ.सू. १२.२४. )

 

*अथ तृणैः परिस्तृणाति । द्वन्द्वं पात्राण्युदाहरति शूर्पं चाग्निहोत्रहवणीं च स्फ्यं च - - - - मा.श. १.१.१.२२

           

अग्निहोत्रहवणी - दैर्घ्ये प्रादेशमात्री, अरत्निमात्री, बाहुमात्री वा हस्त्योष्ठी हंसमुखी वायसपुच्छका - श्रौतयज्ञप्रक्रियापदार्थानुक्रमकोषः - पं. पीताम्बरदत्त शास्त्री(भारद्वाज श्रौत सूत्र से)

*अथ शूर्पं चाग्निहोत्रहवणीं चादत्ते । कर्मणे वां वेषाय वामिति(वा.सं. १.६) यज्ञो वै कर्म यज्ञाय हि तस्मादाह कर्मणे वामिति वेषाय वामिति वेवेष्टीव हि यज्ञम् - मा.श. १.१.२.१

शकटेऽवस्थितानां व्रीहीणां हविरर्थं पृथक्करणं प्रोक्षणार्थोदकधारणमित्यादयोऽग्निहोत्रहवणीव्यापाराः। व्रीहिनिर्वापधारणमुलूखले व्रीहिप्रक्षेपः पुनरुद्धरणं चेत्यादयः शूर्पव्यापाराः - शुक्लयजुर्वेदसंहिता उव्वट -महीधर भाष्य 

*अथ शूर्पमादत्ते । वर्षवृद्धमसीति वर्षवृद्धं ह्येतद्यदि नडानां यदि वेणूनां यदीषीकाणां वर्षमु ह्येवैता वर्धयति।१९। अथ हविर्निर्वपति । प्रति त्वा वर्षवृद्धं वेत्त्विति वर्षवृद्धा उ ह्येवैते यदि व्रीहयो यदि यवा वर्षमु ह्येवैतान्वर्धयति तत्संज्ञामेवैतच्छूर्पाय च वदति नेदन्योऽन्यं हिनसात इति।२०। अथ निष्पुनाति । परापूतं रक्षः परापूता अरातय इत्यथ तुषान्प्रहन्त्यपहतं रक्ष इति तन्नाष्ट्रा एवैतद्रक्षांस्यतोऽपहन्ति।२१। अथापविनक्ति । वायुर्वो विविनक्त्वित्ययं वै वायुर्योऽयं पवत एष वा इदं सर्वं विविनक्ति यदिदं किंच विविच्यते तदेनानेष एवैतद्विविनक्ति स यदैत एतत्प्राप्नुवन्ति यत्रैनानध्यपविनक्ति।२२। अथानुमन्त्रयते । देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना  सुप्रतिगृहीता असन्नित्यथ त्रिः फलीकरोति त्रिवृद्धि यज्ञः।२३। तद्धैके देवेभ्यः शुन्धध्वं देवेभ्यः शुन्धध्वमिति फलीकुर्वन्ति तदु तथा न कुर्यादादिष्टं वा एतद्देवतायै हविर्भवत्यथैतद्वैश्वदेवं करोति यदाह देवेभ्यः शुन्धध्वमिति तत्समदं करोति तस्मादु तूष्णीमेव फलीकुर्यात् - मा.श. १.१.४.१९-२४

*पात्राणि भवन्ति पात्रेषु ह्यशनमश्यते यवमयानि भवन्ति यवान्हि जक्षुषीर्वरुणोऽगृह्णाच्छूर्पेण जुहोति शूर्पेण ह्यशनं क्रियते पत्नी जुहोति मिथुनादेवैतद्वरुणपाशात्प्रजाः प्रमुञ्चति - मा.श. २.५.२.२३

*तस्मादेवमेवाभिमृशेत्ते ह ते गन्धर्वा आसुः शूर्पं यवमान्कृषिरुद्वालवान्धानान्तर्वान् - मा.श. ११.२.३.९

*मुखेऽग्निहोत्रहवणीम्। नासिकयोः स्रुवौ। कर्णयोः प्राशित्रहरणे। शीर्षंश्चमसं प्रणीताप्रणयनम्। पार्श्वयोः शूर्पे। -मा.श. १२.५.२.७

*अथैतां चितां चिन्वन्ति। तस्याम् एनम् आदधति। तस्य नासिकयोस् स्रुवौ निदध्याद् दक्षिणहस्ते जुहूं सव्य उपभृतम् उरसि ध्रुवां मुख ऽग्निहोत्रहवणीं शीर्षतश् चमसम् इळोपवहनं कर्णयोः प्राशित्रहरणे उदरे पात्रीं संवर्तधानीम् आण्डयोर् दृषदुपले शिश्ने शम्याम् उपस्थे कृष्णाजिनम् अनुपृष्ठं स्फ्यं पार्श्वयोर् मुसल च शूर्पे च पत्त उलूखलम्। - जै.ब्रा. १.४८

*अथ ह वै त्रयः पूर्व ऋषय आसुश् शूर्पंयवम् अध्वाना अन्तर्वान् कृषिस् सोल्वालाः। ते ह यज्ञस्य कृन्तत्राणि ददृशुः। - जै.ब्रा. २.४१ (तु. मा.श. ११.२.३.९)

*यो वै दश यज्ञायुधानि वेद मुखतो ऽस्य यज्ञः कल्पते स्फ्यः च कपालानि चाग्निहोत्रहवणी शूर्पं च कृष्णाजिनं च शम्या चोलूखलं च मुसलं च दृषच् चोपला चैतानि वै दश यज्ञायुधानि य एवं वेद मुखतो ऽस्य यज्ञः कल्पते तै.सं. १.६.८.२

*राजसूय वरुणप्रघास--दक्षिणेऽग्नौ जुहोति ।....शूर्पेण जुहोति ।  अन्यम् एव वरुणम् अवयजते ।....तुषैश्च निष्कासेन चावभृथमवैति । - तै.ब्रा. १.६.५.४

*महानग्न्युप ब्रूते स्वस्त्यावेशितं पसः  
इत्थं फलस्य वृक्षस्य शूर्पं शूर्पं भजेमहि  शां.श्रौ.सू. १२.२४. 
 
*ऊर्वोरष्ठीवतोश्चोलूखलमुसले  ३२पादयोः शूर्पशकटे  ३३।  शां.श्रौ.सू. ४.१४.३३

*वानस्पत्यासि दक्षाय त्वेत्यग्निहोत्रहवणीमादत्ते    वेषाय त्वेति शूर्पम्  - आप.श्रौ.सू. १.१७.१

*दशहोतारं व्याख्याय शूर्पे पवित्रे निधाय तस्मिन्नग्निहोत्रहवण्या हवींषि निर्वपति तया वा पवित्रवत्या  १० व्रीहीन्यवान्वा  ११ आप.श्रौ.सू. १.१७.१०

*चातुर्मास्ये वरुणप्रघासपर्व -- संमृष्ट उत्तरोऽग्निर्भवत्यसंमृष्टो दक्षिणः    अथान्तरा वेदी गत्वा यजमानः पत्नी चोत्तरेण वोत्तरां वेदिमैषीके शूर्पे करम्भपात्राण्योप्य शीर्षन्नधिनिधाय पुरस्तात्प्रत्यञ्चौ तिष्ठन्तौ दक्षिणेऽग्नौ शूर्पेण जुहुतः  २३ आप.श्रौ.सू. ८.६.२३

*अथो इन्द्राय पातवे सुनु सोममुलूखलेति सर्वौषधस्य पूरयित्वावहत्येदं विष्णुर्विचक्रम इति मध्येऽग्नेरुपदधाति  तद्विष्णोः परमं पदमिति मुसलम् दिवो वा विष्णविति(वा.सं.५.१९) शूर्पम्  आप.श्रौ.सू. १६.२६.५

दिवो वा विष्ण ऽ उत वा पृथिव्या महो वा विष्णऽउरोरन्तरिक्षात् ।    उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वा प्रयच्छ दक्षिणाद् ओत सव्यात् ।    विष्णवे त्वा ॥ - वा.सं. ५.१९    

*वर्षवृद्धमसीति शूर्पमादत्ते १६  प्रतित्वेति हविरुद्वपति  १७।(वर्षवृद्धम् असि ।

प्रति त्वा वर्षवृद्धं वेत्तु । - वा.सं. १.१६)

  कात्या.श्रौ.सू. २.४.१६

*करम्भपात्राणि जुहोति शूर्पेण मूर्द्धनि कृत्वा दक्षिणेऽग्नौ प्रत्यङ्मुखी कात्या.श्रौ.सू. ५.५.१०

*शूर्पस्योपोहन इति ॥ सूत्रँ    शालीकेरत्रो ह स्माह बौधायनस्तूष्णीँ  शूर्पमुपोहेत्

समस्तेनैवास्मिन्मन्त्रेण पुरोडाशीयानुद्वपेद्वर्षवृद्धमसि प्रति त्वा वर्षवृद्धं वेत्त्विति ॥ - बौ.श्रौ.सू.

*ऐषीकँ  शूर्पमिति ॥ सूत्रं बौधायनस्य। दर्भमयं वा कुशमयं वेति शालीकिः। प्रत्यक्षमित्यौपमन्यवः ॥ शूर्पस्यानुप्रहरण इति अनुप्रहरेदिति बौधायनो नानुप्रहरेदिति शालीकिरद्भिरभ्युक्ष्य भुञ्जीतेत्यौपमन्यवः ॥ - बौ.श्रौ.सू.

*मित्रस्य वश्चक्षुषा प्रेक्ष इति हविष्यान्प्रेक्षते व्रीहीन्यवान्वा  २९  शूर्पे स्रुचमाधाय स्रुचि पवित्रे यजमान हविर्निर्वप्स्यामीत्युक्त्वा हविर्निर्वपत्यग्न इति प्रवसतः  मानव श्रौत सूत्र १.३०

*उत्तरतो गार्हपत्यस्य प्रतिप्रस्थातायवपिष्टानां दध्ना करम्भपात्राणि करोत्येकोद्धीन्यङ्गुष्ठपर्वमात्राणि यावन्तोऽमात्या यजमानस्यैकं चाधिकम् १मीपर्णैः पूरयित्वा शूर्पे निदधाति  - - - -प्रघास्यान्हवामह इति पत्नी १२  करम्भपात्राण्यादायापरेण विहारं दक्षिणातिक्रम्याग्रेण दक्षिणमग्निं पुरस्तात्प्रत्यञ्चाववतिष्ठेते शूर्पँ  शिरसोरवधाय  १३ मो षु ण इन्द्रेति जपति यजमान उत्तरतस्तिष्ठन्  १४  यद्ग्रामे यदरण्य इति जुहुतः शूर्पेण करम्भपात्राणि  १५  अक्रन्कर्म कर्मकृत इति व्युत्क्रामत   मानव श्रौत सूत्र ४.१६

*वानस्पत्यासि इत्यग्निहोत्रहवणीमात्ते  १०  वेषाय त्वा इति शूर्पम् - भा.श्रौ.सू. १.१८.११

*शकट उपविश्य दशहोतारं व्याख्याय यच्छन्तु त्वा पञ्च इति व्रीहीन् यवान् वाग्निहोत्रहवण्यां मुष्टीनोप्य तिरः पवित्रँ  शूर्पे निर्वपति देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नये जुष्टं निर्वपामि इति  १०  त्रीन् मुष्टीन् यजुषा तूष्णीं चतुर्थम्  भारद्वाज श्रौ.सू. १.१९.११

*उत्तरतः शूर्पमुपोहति वैणवमैषीकं नलमयं वा वर्षवृद्धमसि इति   हविरुद्वपति प्रति त्वा वर्षवृद्धं वेत्तु इति  उत्करे परापुनाति परापूतँ  रक्षः परापूता अरातयः इति    अपहतँ  रक्षः इति तुषान् प्रतिहन्ति  भा.श्रौ.सू. १.२२.

*  त्रीणि शूर्पाणि प्रयुनक्ति   त्रीण्युलूखलान्यधिवर्तयति द्वे दृषदौ  समानमा शूर्पस्यादानात्  वेषाय वः इति शूर्पाण्यादत्ते १०  समानमा निर्वपणात् भारद्वाज श्रौ.सू. ६.१६.११ 

*ऐषीके शूर्प उपस्तीर्य करम्भ-पात्राण्योप्याभिघार्य शीर्षन्नधिनिधाय पुरस्तात्प्रत्यङ् तिष्ठन् दक्षिणेऽग्नौ यजमानः सह पत्न्या करम्भपात्राणि जुहोति भा.श्रौ.सू. ८.९.

*मुखेऽग्निहोत्रहवणीम्   नासिकयोः स्रुवौ अक्ष्योर्हिरण्यशकलावा-ज्यस्रुवौ वा   कर्णयोः प्राशित्रहरणे भित्त्वा वैकम्    हन्वोरुलूखलमुसले    दत्सु ग्राव्णो यदि ग्रावाणो भवन्ति शिरसि कपालानि    ललाट एककपालम्    उदरे पिष्टसंयवनीं पात्रीम् नाभ्यामाज्यस्थालीम्  १०  पार्श्वयोः शूर्पे छित्त्वा वैकम्  भारद्वाज पैतृमैधिक सू. १.६.११

*ऽअग्निर्नः शत्रून्ऽ इति( ३.१.१) सूक्ताभ्यामेकविंशतिशर्कराः शूर्पे कृत्वा शत्रून् प्रति निष्पुनाति ॥ - कौशिक पद्धतिः २.४.१४.२०

*यत्त्वा शिक्वःऽ (१०.६.३) इत्यृचा शूर्पमधः गोमयेन लेपयति । - कौ. पद्धति ८.२.६१.१८

यत् त्वा शिक्वः परावधीत् तक्षा हस्तेन वास्या। आपस्त्वा तस्माज्जीवलाः पुनन्तु शुचयः शुचिम्।। इस मन्त्र का विनियोग यूप के तक्षण के लिए है जिसमें कहा जा रहा है कि तक्षा ने यूप बनाने के लिए वृक्ष के जिस भाग की हिंसा की है, उस भाग में जीवन देने वाले आपः आकर पवित्रता प्रदान करें।

*इयं ते धीतिः (अ. ११.१.११) वर्षवृद्धम् (अ. १२.३.१९) इति शूर्पं गृह्णाति ॥ कौशिकसूत्रम् ६१.२३

इयं ते धीतिरिदमु ते जनित्रं गृह्णातु त्वामदितिः शूरपुत्रा। परा पुनीहि य इमां पृतन्यवोऽस्यै रयिं सर्ववीरं नि यच्छ॥

*ऽइयं ते धीतिः इत्यर्धर्चेन शूर्पं गृह्णाति कौशिक पद्धतिः

*त्रयो लोकाः (१२.३.२०) इत्यवक्षीणानभिमृशतः ॥ पुनरायन्तु शूर्पम् (१२.३.२०) इत्युद्वपति ॥ उपश्वसे (११.१.१२) इत्यपवेवेक्ति ॥ कौशिकसूत्र ८,{६१}.२७२९ ॥]

*पादयोः शूर्पम् ॥ कौशिकसूत्र ११,{८१}.१६ ॥

*यज्ञोपवीती दक्षिणपूर्वमन्तर्देशमभिमुखः शूर्प एकपवित्रान्तर्हितान् हविष्यान्निर्वपति ॥ कौशिकसूत्र ११,{८७}.७ ॥

*ततः यज्ञोपवीती दक्षिणपूर्वमन्तर्देशमभिमुखः शूर्प एकपवित्रं निधाय ततो निर्वपति तण्डुलमुष्टिम् ।ऽइदमग्नये कव्यवाहनायऽ इत्येतैर्मन्त्रैस्त्रीनधोमुष्टीन्निर्वपति । ततः पित्र्युपवीतीऽइदमग्नये कव्यवाहनायऽ इति त्रिः सम्प्रोक्षणम् ॥ कौ.प. ११,{८७}. 

तत उलूखल ओप्य त्रिरवहन्तिऽइदं वः पितरो हविःऽ इति मन्त्रेण । ततः शूर्पेण निष्पवनम् ॥ कौ.प. ११,{८७}.१२

पतते मुसलं यत्र हन्यमाने विशेषतः उलूखलं शूर्पं वा धूयते स्वयम्. कौशिकपद्धति १३,२८{११९}

*दक्षिणे पार्श्वे स्फ्यं सव्ये ऽग्निहोत्रहवणीम्। - - -पादयोः शूर्पे। - आश्व.गृह्य सूत्र ४.३.१४

*उत वा घा स्यालात्(ऋ. १.१०९.२)।  - - -स्याल्लाजानावपतीति वा। - - -स्यं शूर्पं स्यतेः। शूर्पमशनपवनं, शृणातेर्वा  यास्क निरुक्त ६.९
श्यम्/स्यम्  वितर्के(विवादे)  काशकृत्स्नधातुपाठः ९.१३२

*पानीविषिभ्यः पः।२३। - - -सुशॄभ्यां निच्च।२६।  - उणादिकोषः ३.२३, २६

*कृशृकुसुस्तुयुरूणां पन्नू च।२.२.२०८। - भोजकृत उणादिसूत्र

*विसृज्य शूर्पवद्दोषान्गुणान्गृह्णन्ति साधवः उद्भटः (शब्दकल्पद्रुमः)

 यदग्निहोत्रहवणीं निष्टपत्यशान्तस्तेन , अग्निहोत्रहवणीं प्रतप्य हस्तोऽवधेयो , हस्तो वा प्रतप्याग्निहोत्रहवण्यामवधेय, स्तेनैवैनं शमयति , तेन प्रीणाति, शान्त एनं प्रीतो न हिनस्ति , इत्थं पर्यावर्तते  मैसं १.८.५
 

 षष्ठी उत्सवे शूर्पस्य महत्त्वम्।