पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(Shamku - Shtheevana)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

 

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Shamku -  Shankushiraa  ( words like Shakata/chariot, Shakuna/omens, Shakuni, Shakuntalaa, Shakti/power, Shakra, Shankara, Shanku, Shankukarna etc. )

Shankha - Shataakshi (Shankha, Shankhachooda, Shachi, Shanda, Shatadhanvaa, Shatarudriya etc.)

Shataananda - Shami (Shataananda, Shataaneeka, Shatru / enemy, Shatrughna, Shani / Saturn, Shantanu, Shabara, Shabari, Shama, Shami etc.)

Shameeka - Shareera ( Shameeka, Shambara, Shambhu, Shayana / sleeping, Shara, Sharada / winter, Sharabha, Shareera / body etc.)

Sharkaraa - Shaaka   (Sharkaraa / sugar, Sharmishthaa, Sharyaati, Shalya, Shava, Shasha, Shaaka etc.)

Shaakataayana - Shaalagraama (Shaakambhari, Shaakalya, Shaandili, Shaandilya, Shaanti / peace, Shaaradaa, Shaardoola, Shaalagraama etc.)

Shaalaa - Shilaa  (Shaalaa, Shaaligraama, Shaalmali, Shaalva, Shikhandi, Shipraa, Shibi, Shilaa / rock etc)

Shilaada - Shiva  ( Shilpa, Shiva etc. )

Shivagana - Shuka (  Shivaraatri, Shivasharmaa, Shivaa, Shishupaala, Shishumaara, Shishya/desciple, Sheela, Shuka / parrot etc.)

Shukee - Shunahsakha  (  Shukra/venus, Shukla, Shuchi, Shuddhi, Shunah / dog, Shunahshepa etc.)

Shubha - Shrigaala ( Shubha / holy, Shumbha, Shuukara, Shoodra / Shuudra, Shuunya / Shoonya, Shoora, Shoorasena, Shuurpa, Shuurpanakhaa, Shuula, Shrigaala / jackal etc. )

Shrinkhali - Shmashaana ( Shringa / horn, Shringaar, Shringi, Shesha, Shaibyaa, Shaila / mountain, Shona, Shobhaa / beauty, Shaucha, Shmashaana etc. )

Shmashru - Shraanta  (Shyaamalaa, Shyena / hawk, Shraddhaa, Shravana, Shraaddha etc. )

Shraavana - Shrutaayudha  (Shraavana, Shree, Shreedaamaa, Shreedhara, Shreenivaasa, Shreemati, Shrutadeva etc.)

Shrutaartha - Shadaja (Shruti, Shwaana / dog, Shweta / white, Shwetadweepa etc.)

Shadaanana - Shtheevana (Shadaanana, Shadgarbha, Shashthi, Shodasha, Shodashi etc.)

 

 

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द्वादशी तिथि

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भीमगया में श्राद्ध के पश्चात् भीमजानु का दर्शन, तत्पश्चात् भस्मकूटतीर्थ पर स्थित भगवान् जनार्दन का दर्शन करके षोडशोपचार अथवा पंचोपचार से उनकी पूजा करे। नैवेद्य के रूप में भगवान् जनार्दन को दध्योदन अर्पित करके शेष दध्योदन से सव्य रहकर अपने तथा अन्य जीवित व्यक्तियों के उद्देश्य से भगवान् जनार्दन के हाथ में पिण्ड प्रदान करे। तदनन्तर मंगलागौरी को प्रणाम कर उनका पूजन करे। फिर  गोप्रचार तीर्थ में जाकर पिण्ड दान करे। वहां से  गदालोलतीर्थ में जाकर स्नान तर्पण करके पितरों का श्राद्ध करे।

भस्मकूटे भस्मनाथं नत्वा च तारयेत्पितॄन्।

त्यक्तपापो भवेमुक्तः सङ्गमे स्नानमाचरेत्॥2.50.65

इष्टिं चक्रेऽश्वमेधाख्यं वसिष्ठो मुनिसत्तमः।

इष्टितो निर्गतः शम्भुर्वरं वृणु वसिष्ठकम्॥2.50.66

प्राहेति तं वसिष्ठोऽपि शिव तुष्टोऽसि मे यदि।

वस्तव्यं चात्र देवेश तथेत्युक्त्वा शिवः स्थितः॥2.50.67

 

शिलाया दक्षिणे हस्ते भस्मकूटो गिरिर्धृतः।

धर्म्मराजेन तत्रास्ते ह्यगस्त्यः सह भार्य्यया॥2.46.56

अगस्त्यस्य पदे स्नातः पिण्डदो ब्रह्मलोकगः।

ब्रह्मणस्तु वरं लेभे माहात्म्यं भुवि दुर्लभम्॥2.46.57

लोपामुद्रां तथा भार्य्यां पितॄणां परमां गतिम्।

तत्रागस्त्येश्वरं दृष्ट्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया॥2.46.58

अगस्त्यञ्च सभार्य्यञ्च पितॄन्ब्रह्मपुरं नयेत्।

 

जनार्दनो भस्मकूटे तस्य हस्ते तु पिण्डदः।

आत्मनोऽप्यथवान्येषां सव्येनापि तिलैर्विना।

जीवतां दधिसंमिश्रं सर्वे ते विष्णुलोकगाः॥2.46.88

यस्तु पिण्डो मया दत्तस्तव हस्ते जनार्दन।

यदुद्दिश्य त्वया देयस्तस्मिन्पिण्डो मृते प्रभो॥2.46.89

एष पिण्डो मया दत्तस्तव हस्ते जनार्दन।

अन्तकाले गते मह्यं त्वया देयो गयाशिरे॥2.46.90

जनार्दन नमस्तुभ्यं नमस्ते पितृमोक्षद।

पितृपते नमस्तेऽस्तु नमस्ते पितृरूपिणे॥2.46.91

 

भीमगया, गोप्रचार व गदालोल के चित्र

तेरहवें दिन का कृत्य ( गया श्राद्ध पद्धति, ले. पं. श्रीरामकृष्ण शास्त्री, - गीताप्रेस, गोरखपुर)

आश्विनकृष्ण द्वादशी को प्रात:काल फल्गुतीर्थ में स्नान-तर्पण आदि कृत्य करके भीमगया पहुँचे और वहाँ संकल्पपूर्वक श्राद्ध करे। श्राद्ध के अनन्तर भीमजानु का दर्शन करे। तत्पश्चात् भस्मकूटतीर्थ पर स्थित भगवान् जनार्दन का दर्शन करके षोडशोपचार अथवा पंचोपचार से उनकी पूजा करे। नैवेद्य के रूप में भगवान् जनार्दन को दध्योदन (दही-भात) समर्पित करके शेष दध्योदन (दहीभात)-से सव्य रहकर अपने तथा अन्य जीवित व्यक्तियों के उद्देश्य से भगवान् जनार्दन के हाथ में पिण्ड प्रदान करे।

प्रतिज्ञा-संकल्प- हाथ में त्रिकुश, अक्षत तथा जल लेकर निम्न प्रतिज्ञा-संकल्प करे

ॐ अद्य गोत्रः शर्माxवर्माः/गुप्तोऽहं शास्त्रोक्तफलप्राप्तिकामः जीवतः एव आत्मनः सम्बन्धीनाञ्च उद्देश्येन गयायां भस्मकूटतीर्थ स्थिते जनार्दनहस्ते पिण्डदानं करिष्ये। हाथ का संकल्प जल छोड़ दे। तदनन्तर तिलरहित दही-भात का पिण्ड बनाकर निम्न मन्त्र द्वारा पिण्डदान करना चाहिये

अपने उद्देश्य से पिण्डदान का मन्त्र-हाथ में त्रिकुश, अक्षत, जल तथा पिण्ड लेकर निम्न मन्त्र से भगवान् जनार्दन के हाथ में पिण्ड समर्पित करे --

एष पिण्डो मया दत्तस्तव हस्ते जनार्दन। अन्तकाले गते मह्यं त्वया देयो गयाशिरे ॥ (वायुपु० १०८ ॥ ८७)

अन्य जीवित सम्बन्धियों के लिये पिण्डदान का मन्त्र- हाथमें त्रिकुश, अक्षत, जल तथा पिण्ड लेकर निम्न मन्त्र पढ़कर भगवान् जनार्दन के हाथ में पिण्ड देना चाहिये

यस्तु पिण्डो मया दत्तो यमुद्दिश्य जनार्दन । देहि देव गयाशीर्षे तस्मै तस्मै मृते तु तम्। जनार्दनो भस्मकूटे तस्य हस्ते तु पिण्डदः। आत्मनोऽप्यथवाऽन्येषां सव्येनापि तिलैर्विना ॥ (वायुपु० १०८।।८५)

पिण्डदान करने के अनन्तर निम्न मन्त्रों को पढ़ते हुए भगवान् जनार्दन को प्रणाम करे

जनार्दन नमस्तुभ्यं नमस्ते पितृमोक्षद। पितृपते नमस्तेऽस्तु नमस्ते पितृरूपिणे । गयायां पितृरूपेण स्वयमेव जनार्दनः । तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं मुच्यते च ऋणत्रयात्। (वायुपु० १०८ ॥ ८८-८९)

तदनन्तर मंगलागौरी को प्रणामकर उनका पूजन करे और फिर गोप्रचार तीर्थ में जाकर पिण्डदान करे। वहाँ से गदालोल तीर्थ में जाकर स्नान-तर्पण करके पितरों का श्राद्ध करे।

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गदालोल तीर्थ का विवरण नारद पुराण व वायुपुराण में उपलब्ध है। इस विवरण के अनुसार हेति असुर ने तप से अस्त्र-शस्त्रादि से अवध्यता का वर प्राप्त कर लिया और उपद्रव करना आरम्भ कर दिया। तब देवों ने विष्णु को गदा प्रदान की जिसके द्वारा विष्णु ने हेति असुर का वध किया और वध के पश्चात् जिस स्थान पर गदा का प्रक्षालन किया, वह गदालोल तीर्थ नाम से प्रसिद्ध हुआ।  हेति असुर क्या होता है, इसका अनुमान यह कहकर लगाया जा सकता है कि हमारे जीवन में जो भी घटित हो रहा है, वह सब हमारी चेतना के सम्यक् विकास के लिए है, हमारा हित साधन करने के लिए है। यह बात अलग है कि हम उसको स्वीकार कर पाते हैं या नहीं। उपनिषदों(बृहदारण्यक व सुबाल) में हृदय के परितः व्याप्त 72000 हिता नाडियों का उल्लेख आता है जिनमें रात्रि में प्राण, अपान आदि जाकर सो जाते हैं। प्राण का जो रूप हिता नाडियों में सोएगा, वैसे ही स्वप्न प्रकट होंगे। हरिवंश पुराण में उल्लेख आता है कि द्वादशी को स्वप्न में उषा को जो अभिभूत कर लेगा, वही उसका भावी पति होगा। इसका अर्थ हुआ कि हिता नाडी में प्राणों के विश्राम करने से जो स्वप्न दिखाई दे रहे हैं, वह सत्य हो भी सकते हैं, नहीं भी। विशेष प्रयत्नों द्वारा उनको सत्य बनाया जा सकता है। प्रयत्न के रूप में एकादशी तिथि तथा गदा का उल्लेख है। गद धातु के विषय में कहा गया है कि यह व्यक्त अव्यक्त स्वरूप है। भागवत पुराण में विष्णु की गदा को ओज-बल-सह का रूप कहा गया है। द्वादशाह नामक सोमयाग में वैराजपृष्ठ नामक चतुर्थ अह में अरणिमंथन द्वारा अग्नि को प्रकट करने के पश्चात् सामवेदी ऋत्विज गान करते हैं ओजो हाउ, बलं हाउ, सहो हाउ इत्यादि। डा. फतहसिंह का विचार है कि ओज, बल, सह यह अलग अलग कोशों के बल हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि जब यह तीनों बल एक साथ सक्रिय हो उठेंगे, तब गद्गद होने की स्थिति बनेगी।

गदा को और अच्छी प्रकार से महाभारत शल्य पर्व के गदोपाख्यान के आधार पर समझा जा सकता है। दुर्योधन सरोवर को स्तम्भित करके उसमें विश्राम करने लगा। जब पाण्डवों को इसका पता चला तो उन्होंने उसे युद्ध के लिए ललकारा। गदायुद्ध हुआ जिसमें नाभि से नीचे गदा प्रहार से दुर्योधन का अंत हुआ। इस आख्यान में विचारणीय तथ्य यह है कि क्या सरोवर के जल के स्तम्भन की प्रक्रिया भी गदा  विद्या में निहित है। जल को प्राणों का रूप कहा जा सकता है। इसका तात्पर्य यह हो सकता है कि जब हम सोते हैं, तब सभी प्राण अचेतन में चले जाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम चेतन स्वरूप को धारण करके निद्रा लें। गया श्राद्ध के संदर्भ में इसे हेति असुर पर गदा का प्रहार करना कहा गया है। ऋग्वेद 10.165.3 में हेति को पक्षिणी संज्ञा दी गई है। इसका अर्थ हुआ कि हेति किसी प्रकार से शकुन से भी सम्बन्ध रखती है। गद का अर्थ होता है व्यक्त होना, व्यक्त करना, कहना। अतः गदा का अर्थ हो सकता है कि हमारे व्यक्तित्व में अभी तक जो कुछ व्यक्त नहीं हो पा रहा था, अचेतन मन में ही सुप्त रूप में स्थित था, अथवा केवल शकुन के रूप में ही व्यक्त हो रहा था, उसे व्यक्त करना गदा द्वारा हेति का वध करना है। लक्ष्मीनारायण संहिता 1.545.36 में एक कथा  में कहा गया है कि राजा नृग के शरीर से निर्गत एकादशी कन्या ने द्वादशी रूपी हेति अस्त्र का उपयोग करके दस्युओं का नाश कर दिया। इसका अर्थ यह हुआ कि हेति का विद्यमान होना द्वादशी तिथि का लक्षण है। और इस हेति का उपयोग अस्त्र की भांति करना है। गया श्राद्ध के संदर्भ में अचेतन पडी हेति का रूपान्तरण गदा द्वारा किया गया है। पुराणों में कहा गया है कि गदा द्वारा हेति के सिर को द्वेधा विभाजित कर दिया गया। निहितार्थ अपेक्षित है। यह भी उल्लेखनीय है कि नारद पुराण में हेति के स्थान पर गयासुर पाठ भी आता है। अतः गयासुर का हेति से साम्य हो सकता है। 

भस्मकूट तीर्थ के संदर्भ में, भस्म का उल्लेख नवमी तिथि को सिकता के संदर्भ में किया जा चुका है कि भस्म का पिण्ड नहीं बनाया जा सकता, सिकता का पिण्ड बनाया जा सकता है, उसकी अव्यवस्था को व्यवस्था में बदला जा सकता है। जो तन्त्र आधुनिक विज्ञान के ब्लैक होल में बदल चुका है, उसकी अव्यवस्था को कैसे बदला जा सकता है। लेकिन वायुपुराण के वर्णन में भस्मकूट पर वसिष्ठ, अगस्त्य व जनार्दन की प्रतिष्ठा कही गई है जिससे इस विषय पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है कि भस्म शब्द केवल पापों के भस्म हो जाने तक ही सीमित है या पाप और पुण्य दोनों के।

त्रयोदशी तिथि

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फल्गु में स्नान करके दूध का तर्पण, गायत्री, सावित्री व सरस्वती तीर्थों पर क्रमशः प्रातः, मध्याह्न और सायं काल स्नान व संध्या।

चौदहवें दिन का कृत्य ( गया श्राद्ध पद्धति, ले. पं. श्रीरामकृष्ण शास्त्री, - गीताप्रेस, गोरखपुर)

आश्विन कृष्ण त्रयोदशी को प्रात:काल फल्गुतीर्थ में स्नान करे और दूध से पितृतर्पण करे। तदनन्तर श्रीगदाधरजी का दर्शन-पूजन एवं विष्णुपद का दर्शन तथा स्पर्श करे और फिर यथाविधि श्राद्ध करे।

 

ब्रह्मवैवर्त्त पुराण २.४१ तथा देवीभागवत पुराण ९.४४.२० में शरत्कृष्ण त्रयोदशी को मघा नक्षत्र में त्रिसन्ध्या में स्वधा पूजा का निर्देश है(आश्विन् कृष्ण त्रयोदशी को मघा नक्षत्र का तिथि के साथ प्रायः योग होता है)। स्वधा शब्द पर टिप्पणी पठनीय है। संक्षेप में स्वधा का कार्य हमारे जीवन को, शरीर को तनाव से प्रतिक्रिया से मुक्त बनाना है। स्व कहते हैं जड महाभूत से रहित स्थिति। पूरी चेतना को स्व को धारण करने योग्य बनाना है। स्वधा पितरों की पत्नी भी है। अतः पितर वही हैं जो हमारी चेतना को तनावों से मुक्त करते हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार तनावों से मुक्त करने में स्टेम सैलों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। वनस्पतियों में जो पुनः अंकुरण का गुण होता है, वह स्टैम सैलों के कारण ही होता है। दुग्ध की उत्पत्ति भी तनावरहित स्थिति में ही हो पाती है। स्वधा के तीन रूपों का उल्लेख है ॐ स्वधा, अस्तु स्वधा तथा स्वधा नमः। इसका याज्ञिक रूप है आ श्रावय, अस्तु श्रौषट् तथा वौषट्। आ श्रावय का उच्चारण करने से वर्षा के लिए उपयुक्त प्रारम्भिक परिस्थितियों का निर्माण होता है, जैसे पुरोवात का बहना। अस्तु श्रौषट् कहने से बादलों, विद्युत आदि का निर्माण होता है। वौषट् का उच्चारण करने से विद्युत तथा गर्जन आदि मेघों का द्रावण कर देते हैं जिससे वर्षा हो जाती है। अथवा सूर्य का ऋतुओं में प्रवेश हो जाता है(असौ वाव वौ, ऋतवो षट्), देवों का पितरों से मिलन हो जाता है।

चतुर्दशी तिथि

http://www.jagran.com/spiritual/religion-pinddanion-grabs-the-tail-of-a-cow-crossing-by-styx-10773193.html

गया। गयाधाम के वैतरणी तालाब के तट पर में पिंडदान करने विधान है। यहां पुरोहित द्वारा गाय की पूंछ पकड़कर वैतरणी पार कराया जाता है। कुछ ऐसा ही पितृपक्ष मेला के समापन की पूर्व संध्या पर काफी संख्या में पिंडदानियों ने गाय की पूछ पकड़कर वैतरणी पार कराया।

पुरोहित ने अपने-अपने पिंडदानियों को गाय की पूंछ पकड़ा कर पूर्वजों का नाम याद कराया। पुरोहित ने पिंडदानी को कहा कि गयाधाम के वैतरणी में गाय की पूंछ पकड़कर पूर्वजों को बैकुंठ लोक में वास कराया जाता है। इस कारण से यहां पिंडदान करना अनिवार्य है। यहां सुबह से लेकर शाम तक गाय की पूंछ पकड़कर पिंडदान कराया गया है। वहीं दूसरी ओर से कुछ सीमित व्यापारी गाय या फिर गाय का बछड़ा लेकर वैतरणी तालाब के आस-पास अपनी दुकान खोलकर बैठे थे। जैसा यजमान वैसा गाय या फिर उनके बछड़ा का दर तय था। कुल मिलाकर देखा जाए तो यहां शांतिपूर्ण और वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच देश व विदेश से आने वाले पिंडदानियों का पिंडदान कराया गया। -[आचार्य लालभूषण मिश्र]

पन्द्रहवें  दिन का कृत्य ( गया श्राद्ध पद्धति, ले. पं. श्रीरामकृष्ण शास्त्री, - गीताप्रेस, गोरखपुर)

पंद्रहवें दिन आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को प्रातःकाल फल्गुतीर्थ में नित्य की तरह स्नान-तर्पणादि क्रिया करे, फिर वैतरणी तीर्थ में जाकर संकल्पपूर्वक पितरों के उद्धार की कामना से वैतरणी स्नान करे, फिर तर्पण तथा श्राद्ध करे। तदनन्तर निम्न मन्त्र से वैतरणी की प्रार्थना करे

 या सा वैतरणी नाम नदी त्रैलोक्यविश्रुता । सावतीर्णा महाभागा पितृणां तारणाय च।

तदनन्तर वैतरणी गोदान करे। ॐ गवे नमः' से वैतरणी गौ का पूजन करने के अनन्तर ब्राह्मण का पूजन करे। तदनन्तर संकल्प करके उस वैतरणी गौ अथवा गोनिष्क्रय द्रव्य का दान ब्राह्मण को कर दे। यहाँ तीर्थपुरोहित की पूजा भी करनी चाहिये।

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वैतरणी

कृष्णां वा पाटलां वापि कुर्याद्वैतरणीं शुभाम्। स्वर्णशृङ्गीं रूप्यखुरां कांस्यपात्रस्य दोहिनीम्॥ कृष्णवस्त्रयुगाच्छन्नां सप्तधान्यसमन्विताम्। कुर्यात्सद्रोणशिखरं आसीनां ताम्रभाजने॥ यमं हैमं प्रकुर्वीत लोहदंडसमन्वितम्। इक्षुदंडमयं बद्ध्वा ह्युडुपं पट्टबंधनैः॥ उडुपोपरि तां धेनुं सूर्यदेहसमुद्भवाम्। कृत्वा प्रकल्पयेद्विद्वांञ्च्छत्रोपानद्युगान्विताम्॥ अंगुलीयकवासांसि ब्राह्मणाय निवेदयेत्। इममु्च्चारयेन्मंत्रं संगृह्यास्याश्च पुच्छकम्॥ ॐयमद्वारे महाघोरे या सा वैतरणी नदी। तर्त्तुकामो ददाम्येनां तुभ्यं वैतरणि नमः॥ इत्यधिवासनमंत्रः॥ गावो मे चाग्रतः संतु गावो मे संतु पृष्ठतः। गावो मे हृदये संतु गवां मध्ये वसाम्यहम्॥ ॐ विष्णुरूप द्विजश्रेष्ठ भूदेव पंक्तिपावन। सदक्षिणा मया दत्ता तुभ्यं वैतरणि नमः॥ इति दानमंत्रः॥ ब्राह्मणं धर्मराजं च धेनुं वैतरणीं शिवाम्। सर्वं प्रदक्षिणीकृत्य ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ पुच्छं संगृह्य सुरभेरग्रे कृत्वा द्विजं ततः॥ धेनुके त्वं प्रतीक्षस्व यमद्वारे महाभये। उत्तितीर्षुरहं धेनो वैतरण्यै नमोऽस्तु ते॥ इत्यनुव्रजमन्त्रः॥ अनुव्रजेत गच्छंतं सर्वं तस्य गृहं नयेत्। - स्कन्द पुराण 5.3159.85, गरुड पुराण 2.35.25/2.47.25

     तरणी नौका को कहते हैं। ऋग्वेद   में सूर्य को ही तरणि कहा गया है जो सारे जगत का तरण करता है(तरणिर् विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य)। लेकिन सूर्य तो तरणि की सबसे विकसित अवस्था है। सबसे पूर्व की स्थिति को वैदिक साहित्य में पृथ्वी की ज्योति अग्नि कहा गया है। मानव शरीर रूपी पृथिवी में यह ज्योति बुद्धि के रूप में विकसित हुई है( अग्निर्धिया स चेतति केतुर्यज्ञस्य पूर्व्यः । अर्थं ह्यस्य तरणि॥ - ऋग्वेद 3.11.3)। इसी बुद्धि को गौ कहा जा रहा है जिसे ब्राह्मण को दान करने का निर्देश है जिससे हमारे पितर नरक की वैतरणी नदी को पार कर सकें। बुद्धि में इन्द्रियों के माध्यम से जो अर्थ उत्पन्न होता है, वह तरणि है। यदि इन्द्रियां विषयों से दूषित हैं तो यह अर्थ भ्रमकारी भी हो सकता है। अतः निर्देश है कि इस बुद्धि रूपी गाय को ब्राह्मण को दे दो, स्वयं अपना आधिपत्य उस पर मत रखो। तभी वह बुद्धि रूपी गाय शुद्ध अर्थ निकाल पाएगी।

     यह विचारणीय है कि क्या इस गौ के विकास की चरम परिणति शिवा या गौरी बनने में है, अथवा सूर्य पत्नी संज्ञा बनने में है? जैमिनीय ब्राह्मण 1.269 के अनुसार दूसरे के मन के विचार आदि जान लेने की सामर्थ्य संज्ञा कहलाती है।

     चतुर्दशी का श्राद्ध शस्त्र, विष आदि घोर कर्मों से मृत व्यक्तियों के लिए करने का निर्देश है। स्कन्द पुराण 7.1.310 के अनुसार घोर से अघोर स्थिति को प्राप्त करना है।

स्कन्द  ५.२.२७.६१ ( आश्विन् चतुर्दशी :नरकेश्वर का माहात्म्य)५.३.७८.१७ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : शस्त्राहतों का श्राद्ध, छत्र दान), ५.३.१७९.१० ( आश्विन् कृष्ण चतुर्दशी : गौमतेश्वर में स्नान, सौ दीपों का दान), ५.३.२०३.३ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : कोटि तीर्थ में स्नान), ६.६९ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : परशुराम ह्रद में तर्पण), ६.१५४.१०( आश्विन् कृष्ण चर्तुदशी को वीर व्रत से युक्त होकर २७ लिङ्गों की पूजा करने का विधान व माहात्म्य ), ६.१९९.५१ ( आश्विन् कृष्ण चतुर्दशी : कूपिका तीर्थ में स्नान), ६.२०४ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : प्रेत मुक्ति हेतु श्राद्ध), ६.२०४.२६( नभस्य मास की चतुर्दशी को प्रेत आदि के श्राद्ध का कथन), ७.१.९४ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : भैरव रुद्र की पूजा), ७.१.२७५ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : त्रिनेत्र लिङ्ग की पूजा), ७.१.२२५ ( अश्वयुज कृष्ण चतुर्दशी : देवशर्मा व यम का नरक सम्बन्धी संवाद), ७.१.२७३ (अश्वयुज कृष्ण चतुर्दशी :शण्ड तीर्थ में स्नान से कृष्ण वृष का श्वेत होना, कपाल मोचन तीर्थ में श्राद्ध), ७.१.३०१ ( अश्वयुज कृष्ण चतुर्दशी : सिद्धेश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.३.३६.१६८( आश्विन् कृष्ण चर्तुदशी को चण्डिका आश्रम में पिण्डदान का माहात्म्य : चण्डिका द्वारा महिषासुर के वध की कथा ),

 

अमावास्या तिथि

जिन पिंडदानियों ने 15 दिनों का पिंडदान किए हैं, वैसे लोगों का सुफल महाल्या के दिन अक्षयवट वृक्ष के नीचे कराया जाएगा। सुफल कराने के लिए सुबह से लेकर शाम तक पिंडदानी अपने-अपने पुरोहितों सम्मुख बैठे रहते हैं। जैसा पुरोहित का आदेश होता है, उसका अनुपालन पिंडदानी करने की कोशिश करते हैं।

http://www.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-completion-of-the-memorial-altar-is-akshyvt-10773185.html

आश्विन मास की अमावास्या तिथि त्रिपाक्षिक गया श्राद्ध का 16वां दिवस है। इस तिथि को अंतिम पिंडदान अक्षयवट वेदी पर होता है। यहां पिंडदान से पितर ब्रहमलोक को प्राप्त करते हैं।

अक्षयवट वेदी पर स्थित वट वृक्ष युग-युगान्तर में भी नष्ट नहीं होता। कलियुग के अंत में महाप्रलय होने पर संपूर्ण पृथ्वी जल में डूब जाती है किन्तु वटवृक्ष पर भगवान विष्णु बालक रूप में योग निद्रा में शयन करते हैं। मोक्षधाम गया में एकमात्र वटवृक्ष ही साक्षी हुआ था। जब सीता ने दशरथ के आग्रह पर बालू का पिंडदान करके उन्हें मुक्त किया था। उसी समय वट वृक्ष को अक्षय होने का आशीर्वाद मिला था। वृन्दावन, प्रयाग एवं उज्जैन (कुमुद्वतीपुरी) में भी अक्षयवट वृक्ष है।

पिंडदान के बाद अक्षयवट के दर्शन नमस्कार का भी विधान है। समीप में स्थित छोटे मंदिर के बटेश्वर शंकर भी दर्शनीय वेदी है। ये दर्शन मात्र से पितरों का उद्धार करते हैं। उतर दिशा में बड़े मंदिर में प्रपितामह शंकर अंतिम दर्शनीय वेदी है। इनके दर्शन से 100 कुल का उद्धार होता है। गया श्राद्ध की पूर्णता गयाधाम के पंडाजी (ब्राहमण कल्पित ब्राहमण) के द्वारा होती है। इन्हें ब्रहमा ने अपने मानस से उत्पन्न किया था। दान एवं दक्षिणा से संतुष्ट होकर पंडाजी श्रद्धकर्ता की पीठ पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हैं और कहते हैं कि श्राद्ध पूर्ण हुआ।

सोलहवें दिन का कृत्य ( गया श्राद्ध पद्धति, ले. पं. श्रीरामकृष्ण शास्त्री, - गीताप्रेस, गोरखपुर)

आश्विन कृष्ण अमावास्या को प्रात:काल फल्गुतीर्थ में स्नानादि कृत्य सम्पन्न करके अक्षयवट के समीप जाकर उसके नीचे उत्तर दिशा की ओर पितरों का श्राद्ध करे। तदनन्तर शय्यादान करे-'सोपस्करशय्यायै नमः' कहकर शय्या का तथा भगवान् विष्णु का पूजन करे और इमां विष्णुदैवत्यां शय्यां तुभ्यमहं सम्प्रददे' कहकर ब्राह्मण को शय्या प्रदान करे। निम्न मन्त्र से शय्या की प्रार्थना करे

यथा न कृष्णशयनं शून्यं सागरजातया । शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा जन्मनि जन्मनि । ब्राह्मण शय्या की पाटी का स्पर्शकर स्वस्ति' बोले। शय्यादान की प्रतिष्ठा सांगतासिद्धि के लिये सुवर्ण अथवा निष्क्रयद्रव्य भी प्रदान करे। यथाशक्ति वर्षाशन भी प्रदान करे।

तदनन्तर ब्राह्मणभोजन का संकल्प करे और यथाशक्ति ब्राह्मणों को वटवृक्ष के नीचे भोजन कराये और उनका आशीर्वाद ग्रहण करे।

तत्पश्चात् अक्षयवटेश्वर का दर्शन कर निम्न मन्त्र से प्रणाम करे

एकार्णवे वटस्याग्रे यः शेते योगनिद्रया । बालरूपधरस्तस्मै नमस्ते योगशायिने ॥ और फिर पितरों की अक्षयब्रह्मलोक प्राप्ति की कामना से निम्न मन्त्र से अक्षयवट की पूजा-प्रार्थना करे

संसारवृक्षशस्त्रायाशेषपापक्षयाय च । अक्षय्यब्रह्मदात्रे च नमोऽक्षय्यवटाय च ॥

पुनः अपनी शक्ति के अनुसार पितरों के निमित्त सोलह या दश दान करे।

गाथा वटवृक्ष की

तीर्थदीपिका में पाँच वटवृक्षों का वर्णन मिलता है-

वृन्दावने वटो वंशी प्रयागेय मनोरथा:।

गयायां अक्षय ख्यातः कल्पस्तु पुरुषोत्तमे ।।

निष्कुंभ खलु लंकायां मूलैकः पंचधा वटः ।

स्तेषु वटमूलेषु सदा तिष्ठति माधवः ।।

 

अमावास्या को अक्षय वट की कल्पना करने की आवश्यकता क्यों पडी, इसका उत्तर यह हो सकता है कि अमावास्या को चन्द्रमा की 15 कलाएं तो क्षीण हो जाती हैं, केवल 16वीं कला शेष रहती है जिसे षोडशी कहा जाता है। तब चन्द्रमा इस षोडशी कला के साथ पृथिवी पर ओषधियों आदि में प्रवेश कर जाता है। हमारे व्यक्तित्व के लिए ओषधि क्या है, इसे समझने के लिए ओषधि शब्द पर टिप्पणी द्रष्टव्य है। संक्षेप में, हमारे व्यक्तित्व का जो भाग ऊर्ध्वमुखी विकास कर सकता है, गुरुत्वाकर्षण की शक्ति के विपरीत दिशा में गति कर सकता है, वह ओषधि है। इसका नाम ओषधि इसलिए है कि यह जड शरीर की चिकित्सा करता है। षोडशी कला ध्रुव है, अक्षय है। षोडशी कला ही ऐसी है जो धनात्मक है। राधा को धन कहा जाता है। धनात्मक को इस प्रकार समझा जा सकता है कि विज्ञान में तापगतिकी के दूसरे नियम के अनुसार इस विश्व की ऊर्जा ऋणात्मकता की ओर जा रही है, उस ओर जहां ऊर्जा होते हुए भी उसका कोई उपयोग नहीं रह जाता, वह उपयोग के लायक नहीं रहती, वैसे ही जैसे वाष्प जब तक इंजन के सिलिंडर में बंद रहती है, उससे कोई भी कार्य लिया जा सकता है। जब उसे मुक्त कर दिया जाता है तो उससे कोई कार्य नहीं लिया जा सकता।

 

आश्विन् शुक्ल प्रतिपदा

http://memorial-in-hindu.blogspot.in/2011/09/blog-post_8833.html

गायत्री घाट पर दही अक्षत का पिण्ड देकर गया श्राद्ध की समाप्ति

सत्रहवें दिन का कृत्य ( गया श्राद्ध पद्धति, ले. पं. श्रीरामकृष्ण शास्त्री, - गीताप्रेस, गोरखपुर)

आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को गायत्री तीर्थ में जाकर नित्य की तरह प्रातः फल्गुतीर्थ में स्नानादि क्रिया सम्पन्न कर गायत्री तीर्थ में श्राद्ध का संकल्प कर दही-चावल के पिण्ड से यथाविधि मातामहादि का श्राद्ध करे।

साक्षी श्रवणकर्म-

समस्त श्राद्धकर्म पूर्ण करने के अनन्तर निम्न प्रार्थना द्वारा साक्षीश्रवण करके गयायात्रा पूर्ण करे

साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मेशानादयस्तथा। मया गयां समासाद्य पितृणां निष्कृतिः कृता॥ आगतोऽस्मि गयां देव पितृकार्ये गदाधर ।

त्वमेव साक्षी भगवन्ननृणोऽहमृणत्रयात्॥ (वायुपुराणं) ब्रह्मा, शिव आदि देवता मेरे कर्म के साक्षी हो। मैंने गया में आकर अपने पितरों के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। हे देव गदाधर पितृकार्यके लिये मैं गया में आया हूँ। हे भगवन्! आप ही इसमें साक्षी होवें, मैं ऋणत्रयसे मुक्त हो जाऊँ। भगवत्-स्मरण-निम्न मन्त्रों से प्रार्थना करे प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः। यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्। यत्पादपङ्कजस्मरणाद यस्य नामजपादपि। न्यूनं कर्म भवेत् पूर्णं तं वन्दे साम्बमीश्वरम्॥ ॐ विष्णवे नमः । ॐ विष्णवे नमः । ॐ विष्णवे नमः। ॐ साम्बसदाशिवाय नमः। ॐ साम्बसदाशिवाय नमः। ॐ साम्बसदाशिवाय नमः ।

 

गया तीर्थ में विभिन्न तिथियों पर जो पितर श्राद्ध सम्पन्न किए जाते हैं, उनमें आध्यात्मिक रूप से क्या तारतम्य है, यह ज्ञात नहीं है। लक्ष्मीनारायण संहिता खण्ड 2 (त्रेतायुगसन्तानः), अध्याय 218 से 231 तक बालकृष्ण द्वारा आश्विन् कृष्ण पक्ष में किए गए कृत्यों का विवरण प्राप्त होता है। इस विवरण को आजकल के अनुसार एक डायरी में लिखा गया विवरण मान सकते हैं और इस आधार पर गया श्राद्ध के कृत्यों को समझने का प्रयत्न किया जा सकता है। लक्ष्मीनारायण संहिता के अनुसार आश्विन् कृष्ण पंचमी से लेकर एकादशी तक कृष्ण एक यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं जो पञ्चमी तिथि से आरम्भ होकर एकादशी को समाप्त होता है तथा द्वादशी को यज्ञ का अवभृथ स्नान होता है।

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