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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(Shamku - Shtheevana)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

 

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Shamku -  Shankushiraa  ( words like Shakata/chariot, Shakuna/omens, Shakuni, Shakuntalaa, Shakti/power, Shakra, Shankara, Shanku, Shankukarna etc. )

Shankha - Shataakshi (Shankha, Shankhachooda, Shachi, Shanda, Shatadhanvaa, Shatarudriya etc.)

Shataananda - Shami (Shataananda, Shataaneeka, Shatru / enemy, Shatrughna, Shani / Saturn, Shantanu, Shabara, Shabari, Shama, Shami etc.)

Shameeka - Shareera ( Shameeka, Shambara, Shambhu, Shayana / sleeping, Shara, Sharada / winter, Sharabha, Shareera / body etc.)

Sharkaraa - Shaaka   (Sharkaraa / sugar, Sharmishthaa, Sharyaati, Shalya, Shava, Shasha, Shaaka etc.)

Shaakataayana - Shaalagraama (Shaakambhari, Shaakalya, Shaandili, Shaandilya, Shaanti / peace, Shaaradaa, Shaardoola, Shaalagraama etc.)

Shaalaa - Shilaa  (Shaalaa, Shaaligraama, Shaalmali, Shaalva, Shikhandi, Shipraa, Shibi, Shilaa / rock etc)

Shilaada - Shiva  ( Shilpa, Shiva etc. )

Shivagana - Shuka (  Shivaraatri, Shivasharmaa, Shivaa, Shishupaala, Shishumaara, Shishya/desciple, Sheela, Shuka / parrot etc.)

Shukee - Shunahsakha  (  Shukra/venus, Shukla, Shuchi, Shuddhi, Shunah / dog, Shunahshepa etc.)

Shubha - Shrigaala ( Shubha / holy, Shumbha, Shuukara, Shoodra / Shuudra, Shuunya / Shoonya, Shoora, Shoorasena, Shuurpa, Shuurpanakhaa, Shuula, Shrigaala / jackal etc. )

Shrinkhali - Shmashaana ( Shringa / horn, Shringaar, Shringi, Shesha, Shaibyaa, Shaila / mountain, Shona, Shobhaa / beauty, Shaucha, Shmashaana etc. )

Shmashru - Shraanta  (Shyaamalaa, Shyena / hawk, Shraddhaa, Shravana, Shraaddha etc. )

Shraavana - Shrutaayudha  (Shraavana, Shree, Shreedaamaa, Shreedhara, Shreenivaasa, Shreemati, Shrutadeva etc.)

Shrutaartha - Shadaja (Shruti, Shwaana / dog, Shweta / white, Shwetadweepa etc.)

Shadaanana - Shtheevana (Shadaanana, Shadgarbha, Shashthi, Shodasha, Shodashi etc.)

 

 

 

गया श्राद्ध

भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी

http://memorial-in-hindu.blogspot.in/2011/09/blog-post_8833.html

पुनपुन नदी तट पर श्राद्ध

 

भाद्रपद पूर्णिमा

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फल्गु नदी में स्नान व नदी पर खीर से पिण्डदान

ब्रह्मणा प्रार्थितो विष्णुः फल्गुको ह्यभवत्पुरा।

दक्षिणाग्नौ हुतं तत्र तद्रजः फल्गुतीर्थकम्॥2.49.15॥

तस्मिन्फलति फल्ग्वा गौः कामधेनुर्जलं मही।

दृष्टेरन्तर्गतं यस्मात्फल्गुतीर्थं न निष्फलम्॥2.49.16॥ - वायु पुराण 111.

 

                                                                   

प्रतिपदा

ब्रह्मकुण्ड, प्रेतशिला, रामकुण्ड व रामशिला पर श्राद्ध व काकबलि

http://www.jagran.com/spiritual/religion-pitru-paksha-10740164.html

गया। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि शुक्रवार त्रिपाक्षिक गया श्राद्ध का द्वितीय दिवस है। इस तिथि को प्रेतशिला एवं रामशिला की वेदियों पर पिंडदान के बाद समीप में स्थित देवताओं के दर्शन पूजन किए जाते हैं। दर्शनीय देवता भी 360 वेदियों में गिने जाते हैं। सर्वप्रथम प्रेतशिला के उत्तर में स्थित प्रेतकुंड पर तर्पण एवं श्राद्ध होते हैं। प्रेतकुंड को ब्रह्मकुंड तथा प्रेतशिला को प्रेत पर्वत भी कहा जाता है। प्रेतकुंड के अग्नि कोण में पिंड छोड़ा जाता है। कुंड की तीन दिशाओं में चार शिव मंदिर है। ये चारों शंकर प्रेत को श्राद्धकर्ता द्वारा दर्शन पूजन किए जाने पर प्रेतत्व से मुक्त करते हैं। इसके बाद 676 सीढि़यों से चढ़कर प्रेत पर्वत (प्रेतशिला) पर श्राद्ध होता है। पिंड ब्रह्म के चरण पर चढ़ाया जाता है। पत्थर से निर्मित छत्त वाले आठ स्तंभ के चौकोर बरामदे में ब्रह्म का चरण है। एड़ी उत्तर की ओर तथा अंगूठा दक्षिण की ओर है।

पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा की ओर खींची गई सुवर्ण रेखा पर यह चरण है। चरण से उत्तर दिशा में दक्षिण मुख वाले चतुर्भुज विष्णु हैं। इनके दर्शन नमस्कार मुक्तिदायक होते हैं। चरण से पश्चिम दिशा में 6 फीट गुणा 4 फीट के आकार का शिला है। जिसके समीप ही उत्तर मुख वाली तीन प्रेत मूर्तियां हैं। इनके पास तिल मिला हुआ सत्तू छींटने का विधान है।

[आचार्य लालभूषण मिश्र]

गया श्राद्ध पद्धति -  पं.  रामकृष्ण शास्त्री (गीताप्रेस, गोरखपुर)

दूसरे दिन का कृत्य 

दूसरे दिन अर्थात् आश्विन् कृष्ण प्रतिपदा को फल्गुतीर्थ में स्नान कर गया के वायव्यकोण में स्थित प्रेतपर्वत पर जाकर वहाँ  ईशानकोण में स्थित ब्रह्मकुण्ड तीर्थ पर जाना चाहिये। वहाँ संकल्पपूर्वक ब्रह्मकुण्डमें स्नान करे। तदनन्तर तर्पणकर संकल्पपूर्वक श्राद्ध करे। श्राद्ध के लिये ब्रह्मकुण्ड का जल लेकर प्रेतपर्वत पर सुवर्णरेखांकित प्रेतशिलाके समीप जाकर हाथ-पैर धोकर पवित्र हो जाय और आसन पर बैठकर आचमन करे। श्राद्धस्थल को जल से शुद्ध कर ले। पुनः अपसव्य दक्षिणाभिमुख होकर कव्यवाडादि पितरों का ध्यान करे और श्राद्ध का संकल्प कर श्राद्ध सम्पादित करे। वहीं पर प्रेतत्व मुक्ति की इच्छा से अपने बन्धु-बान्धवोंके लिये भी पिण्डदान करे और प्रेतत्व से छुटकारा दिलाने के लिये संकल्पपूर्वक निम्न मन्त्र से क्रमशः तिलमिश्रित सक्तु (सत्तू) भूमि पर छिड़के

ये केचित्प्रेतरूपेण वर्तन्ते पितरो मम ।

ते सर्वे तृप्तिमायान्तु सक्तुभिस्तिलमिश्रितैः।

इसके बाद निम्न मन्त्र से तिलमिश्रित जलांजलि पितृतीर्थ से प्रदान करे

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं यत्किञ्चित् सचराचरम्।

मया दत्तेन तोयेन तृप्तिमायान्तु सर्वशः।।

इस प्रकार तिलतोयांजलि देकर ब्राह्मण को दक्षिणा प्रदान करे।

तदनन्तर वहाँ से नीचे प्रभास पर्वत से लगे हुए रामतीर्थमें जाकर स्नान का संकल्प करे और निम्न मन्त्रसे रामकुण्ड पर मार्जन स्नान करे

जन्मान्तरशतं साग्रं यन्मया दुष्कृतं कृतम्।

तत्सर्वं विलयं यान्तु रामतीर्थाभिषेचनात्॥

तदनन्तर तर्पण एवं श्राद्ध करे। श्राद्ध के अनन्तर पापों से मुक्ति प्राप्त करने के लिये भगवान् श्रीराम को निम्न मन्त्रसे प्रार्थनापूर्वक प्रणाम करे

राम राम महाबाहो देवानामभयङ्कर।

त्वां नमाम्यत्र देवेश मम नश्यतु पातकम्।।

इसके बाद प्रभास क्षेत्र में रामशिला पर जाकर श्राद्ध करे और तीर्थ को प्रणाम करने के अनन्तर अपने त्रिविध पापोंके नाश के लिये निम्न मन्त्र से रामतीर्थ और प्रभासतीर्थ को नमस्कार करे

आपस्त्वमसि देवेश ज्योतिषां पतिरेव च।

पापं नाशय देवेश मनोवाक्कायकर्मजम्॥

तदनन्तर यमराज तथा धर्मराज की प्रसन्नता तथा पितरों की मुक्तिके लिये निम्न मन्त्र से तिलजलमिश्रित भात की बलि प्रदान करे

यमराज धर्मराजौ निश्चलार्थं हि संस्थितौ।

ताभ्यां बलिं प्रयच्छामि पितॄणां भुक्तिमुक्तये॥

यमराजधर्मराजाभ्यामेष बलिर्न मम।।

तदनन्तर नग नामक पर्वत पर निम्न श्लोक से उसी प्रकार श्वानों को बलि प्रदान करे

द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ।

ताभ्यां बलिं प्रयच्छामि रक्षेतां पथि सर्वदा॥

एष बलिः श्वभ्यां न मम।।

 

प्रेतशिला वेदी का विवरण व चित्र

 

भविष्य पुराण 1.17 के अनुसार प्रतिपदा तिथि को ब्रह्मा की प्रतिमा रथ में स्थापित करके उनके दाहिनी ओर सावित्री को स्थापित करना चाहिए और रथ को नगर में घुमाना चाहिए। ऐसा कहा जा सकता है कि गया में प्रतिपदा श्राद्ध के संदर्भ में नगर में भ्रमण का कार्य प्रेतकुण्ड या ब्रह्मकुण्ड पर अग्निकोण में पिण्डदान करके प्रतीक रूप में पूरा किया जाता है। नगर में भ्रमण का कार्य तिर्यक् दिशा में भ्रमण है। प्रेत को तिर्यक् दिशाओं से ऊपर उठकर ऊर्ध्व दिशा में अपनी यात्रा आरम्भ करनी है। इसके प्रतीक रूप में प्रेतशिला पर आरोहण और पिण्डदान हो सकता है।

 ब्रह्मशिला  को ब्रह्मपद का स्थान कहा जाता है। ब्रह्मशिला पर बने मन्दिर के बाहर पिण्डदान का कार्य सम्पन्न करके पिण्डों को मन्दिर के अन्दर बने ब्रह्मा के पद में रख दिया जाता है। पंचमी को विष्णुपद पर पिण्डदान किया जाता है। अतः यह जानना महत्त्वपूर्ण होगा कि ब्रह्मा के पद और विष्णु के पद में क्या अन्तर है। अथर्वशीर्ष उपनिषद में ब्रह्मा के पद को ओंकार की प्रथम मात्रा का रूप (अकार) कहा गया है, विष्णु के पद को द्वितीय मात्रा (उकार) तथा ईशान के पद को तृतीय मात्रा (मकार) तथा चतुर्थ अव्यक्त अर्धमात्रा को अनामय  कहा गया है। हठयोग में अकार से तात्पर्य  श्वास के आदान से लिया जाता है, उ कार से धारण या कुम्भक तथा मकार से श्वास का विसर्जन किया जाता है। ब्रह्मा का कार्य सृष्टि करने का है, अतः यह उल्लेख एक नई दृष्टि प्रदान करता है कि आदान में सृष्टि कार्य भी निहित है। व्यावहारिक रूप में आदान से अर्थ यह लिया जा सकता है कि समाज से हम क्या ग्रहण करते हैं भोजन, शिक्षा आदि।  धारण में सृष्टि का पालन तथा विसर्जन में संहार निहित हैं। जैसा कि अन्यत्र उल्लेख हो चुका है, ब्रह्मा का एक प्रमुख कार्य यह है कि वह सृष्टि में सममिति को पूरा करते हैं। इस सृष्टि में पद पद पर सममिति की न्यूनता है (गोवान ) जिसे ब्रह्मा पूरा करते हैं। ब्रह्माण्ड पुराण  1.1.5.61 आदि में कहा गया है कि ब्रह्मा ने इस सृष्टि में चार प्रकार से प्रवेश किया स्थावरों या जड जगत में विपर्यास के रूप में, तिर्यकों में शक्ति के रूप में, मनुष्यों में सिद्धि - बुद्धि के रूप में और देवों में पुष्टि के रूप में। विपर्यास का अर्थ होता है दर्पण सममिति, मिरर सिमीट्री। तिर्यक् अर्थात् पशु आदि। इसका अर्थ होगा कि ब्रह्मशिला पर हमें ब्रह्मा बनकर प्रेत की चेतना की प्रत्येक असममिति को पूरा करना है, तभी प्रेत का उद्धार हो सकता है।

प्रेतशिला पर पिण्डदान के पश्चात् रामतीर्थ में स्नान व रामशिला पर पिण्डदान का निर्देश है। वायु पुराण के निम्नलिखित विवरण से स्पष्ट होता है कि यह स्थान(प्रेतशिला व रामशिला दोनों) प्रभास पर्वत के अन्तर्गत आते हैं। और यह प्रभास पर्वत महानदी से संगम करता है। स्वयं प्रभास पर्वत पादाङ्गुष्ठ के ऊपर स्थित है। इस विवरण को समझने के लिए यह उल्लेख कर देना उपयुक्त होगा कि गया क्षेत्र का निर्माण शाप से शिला बन गई मरीचि ऋषि की पत्नी से हुआ है। इस शिला को गयासुर की देह पर रख दिया गया। कहा गया है कि प्रभास पर्वत रूपी शिला को गयासुर के पाद पर रखने पर भी गयासुर का पादांगुष्ठ बाहर निकल आया जो प्रभासेष देव(शिव) बन गया। महानदी का उद्भव कैसे हुआ, इसका उल्लेख यहां नहीं है। लेकिन वायुपुराण के विवरण से इतना तो स्पष्ट हो रहा है कि सममिति पूरण का कार्य ब्रह्मपद पर केवल आदान तक ही सीमित नहीं है, अपितु उसे आगे धारण और विसर्जन तक बढाया जा रहा है। यह  विचारणीय है कि भौतिक देह के पादांगुष्ठ से इन क्रियाओं का कितना सम्बन्ध है। वायुपुराण में कहा जा रहाहै कि जब पादांगुष्ठ पर भास्कर का तेज पडा, तो पादांगुष्ठ बाहर निकल आया। व्यावहारिक रूप में, अपनी देह के पादांगुष्ठ पर हमें अपनी चेतना को ले जाना है जिससे वहां की चेतना प्रकट हो सके। और पादांगुष्ठ के माध्यम से शक्ति का आदान आरम्भ हो सके। छोटे बच्चों में पादांगुष्ठ से आदान का मार्ग खुला होता है।

वर्तमान मास का नाम आश्विन मास है और अश्विनौ का कार्य चिकित्सा करना होता है, अतः सममिति के पूरण के रूप में चिकित्सा की जा रही है, यह समझा जा सकता है।

वायु पुराण का विवरण

आच्छादितः शिलापादः प्रभासेनाद्रिणा यतः।

भासितो भास्करेणेति प्रभासः परिकल्पितः॥2.46.13

प्रभासं हि विनिर्भिद्य शिलाङ्गुष्ठो विनिर्गतः।

अङ्गुष्ठोत्थित ईशोऽपि प्रभासेशः प्रकीर्तितः॥2.46.14

शिलाङ्गुष्ठैकदेशो यः सा च प्रेतशिला स्मृता।

पिण्डदानाद्यतस्तस्यां प्रेतत्वान्मुच्यते नरः॥2.46.15

महानदीप्रभासाद्र्योः सङ्गमे स्नानकृन्नरः।

रामो देव्या सह स्नातो रामतीर्थं ततः स्मृतम्॥2.46.16

प्रार्थितोऽत्र महानद्या राम स्नातो भवेति च।

रामतीर्थं ततो भूत्वा त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥2.46.17

जन्मान्तरशतं साग्रं यत्कृतं दुष्कृतं मया।

तत्सर्वं विलयं यातु रामतीर्थाभिषेचनात्॥2.46.18

मन्त्रेणानेन यः स्नात्वा श्राद्धं कुर्वीत मानवः।

रामतीर्थे पिण्डस्तु विष्णुलोकं प्रयात्यसौ।

तथेत्युक्त्वा स्थितो रामः सीतया भरताग्रजः॥2.46.19

राम राम महाबाहो देवानामभयङ्कर।

त्वां नमस्येऽत्र देवेशं मम नश्यतु पातकम्॥2.46.20

मन्त्रेणानेन यः स्नात्वा श्राद्धं कुर्यात्सपिण्डकम्।

प्रेतत्वात्तस्य पितरो विमुक्ताः पितृतां ययुः॥2.46.21

आपस्त्वमसि देवेश ज्योतिषां पतिरेव च।

पापं नाशय मे देव मनोवाक्कायकर्मजम्॥2.46.22

नमस्कृत्य प्रभासेशं भासमानं शिवं व्रजेत्।

तञ्च शम्भुं नमस्कृत्य कुर्याद् यमबलिं ततः॥2.46.23

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शिलाया जघनं भूयः समाक्रान्तं नगेन तु।

धर्मराजेन संप्रोक्तो न गच्छेति नगः स्मृतः॥2.46.28

यमराजधर्मराजौ निश्चलार्थं व्यवस्थितौ।

ताभ्यां बलिं प्रयच्छामि पितॄणां मुक्ति हेतवे॥2.46.29

द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ।

ताभ्यां बलिं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ॥2.46.30

ऐन्द्रवारुण वायव्ययाम्यनैर्ऋत्यसंस्थिताः।

वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूयो पिण्डं मया स्थितम्॥2.46.31

यमोऽसि यमदूतोऽसि वायसोऽसि महाबल।

सप्तजन्मकृतं पापं बलिं भुक्त्वा विनाशय॥2.46.32

द्वितीया तिथि

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उत्तरमानस(पितामहेश्वर) , उदीची, कनखल, दक्षिणमानस(सूर्यकुण्ड) और जिह्वालोल  तीर्थों पर पिण्डदान

उत्तर-मानस में श्राद्ध से पितरों को होती है सूर्यलोक की प्राप्ति

त्रैपाक्षिक गया श्राद्ध में तीसरे दिन उत्तरार्क पितामहेश्वर स्थित उत्तर-मानस में श्राद्ध करना चाहिए। यहां पर मध्याह्नकालीन सूर्य भगवान हैं। उत्तर मानस में सविधि श्राद्ध सम्पन्न करके मौन-यात्रा करते हुए दक्षिण की ओर बढ़ना चाहिए। बीच में मौनार्क जो ब्राह्मणी घाट में स्थित प्रातःकालीन सूर्य भगवान हैं, उन्हें मानस प्रणाम कर आगे बढ़कर सूर्यकुण्ड स्थित जल स्पर्श कर सायंकालीन सूर्य भगवान को प्रणाम करने के बाद ही मौन व्रत तोड़ना चाहिए।

यहां उत्तर में उदीची तीर्थ मध्य में कनखल तीर्थ और दक्षिण में दक्षिण मानस तीर्थ का श्राद्ध सम्पन्न होता है। यह सभी भगवान के वरदान के माध्यम से गयासुर के शरीर पर स्थित हैं। यह श्राद्ध सम्पन्न करके विष्णुपद के ईशान कोण पर जिह्वालोल वेदी पर श्राद्ध करना चाहिए। फिर षोडषोपचार(सोलह उपचार) से पूजन करके भगवान से पितरों की मुक्ति के लिए प्रार्थना करना चाहिए। इस प्रकार त्रैपाक्षिक श्राद्ध में तृतीय दिन का क्रम पूरा करना चाहिए।

 

तीसरे दिन का कृत्य (गया श्राद्ध पद्धति(गीताप्रेस, गोरखपुर)

तीसरे दिन अर्थात् आश्विन कृष्ण द्वितीया को पंचतीर्थी कृत्य अर्थात् उत्तरमानस, उदीची, कनखल, दक्षिणमानस तथा जिह्वालोल-इन पाँच तीर्थो में पिण्डदानादि कृत्य होता है। - फल्गुतीर्थमें स्नान-तर्पण करके उत्तरमानसतीर्थ में जाकर और तीर्थजल से आचमन तथा मार्जन कर स्नान का संकल्प करे तथा निम्न मन्त्र पढ़कर आत्मशुद्धि एवं सूर्यलोक प्राप्ति तथा पितरों की मुक्ति की कामना से तीर्थ में स्नान करे

उत्तरे मानसे स्नानं करोम्यात्मविशुद्धये। सूर्यलोकादिसंसिद्धिसिद्धये पितृमुक्तये॥

स्नान के अनन्तर तीर्थ में यथाविधि श्राद्ध करे और फिर पितरों को सूर्यलोक की प्राप्ति कराने के उद्देश्य से उत्तरार्क का पूजन करे। तदनन्तर मौन होकर दक्षिण मानसतीर्थ में जाकर उदीची तीर्थ में मार्जन-स्नान का संकल्प कर निम्न मन्त्र से मार्जन-स्नान तथा सूर्यप्रार्थना करे

ब्रह्महत्यादिपापौघः यातनाया विमुक्तये। दिवाकर करोमीह स्नानं दक्षिणमानसे॥

नमामि सूर्यं तृप्त्यर्थं पितॄणां तारणाय च । पुत्रपौत्रधनैश्वर्यायुरारोग्यवृद्धये ll

इसके पश्चात् श्राद्ध करे। तदनन्तर कनखलतीर्थ में जाकर मार्जन-स्नान एवं श्राद्ध करे। फिर दक्षिणमानस तीर्थ में स्नान का संकल्प करे और निम्न मन्त्रपूर्वक तीर्थ में मार्जन-स्नान करे

दक्षिणे मानसे स्नानं करोम्यात्मविशुद्धये ।। सूर्यलोकादिसंसिद्धिसिद्धये पितृमुक्तये। मार्जन-स्नान करके श्राद्धकर्म करे और दक्षिणार्क को प्रणाम निवेदन करे तथा मौन होकर पूजन करे। तदनन्तर फल्गुतीर्थ में जाकर मार्जन-स्नानादि करके जिह्वालोल पर श्राद्ध करे। फिर दक्षिणदिशा स्थित मधुश्रवा नाम के पितामह का पूजनकर निम्न मन्त्र से उन्हें प्रणाम करे

नमः शिवाय देवाय ईशानपुरुषाय च। अघोरवामदेवाय सद्योजाताय शम्भवे ॥

पुनः फल्गुतीर्थ में जाकर मार्जन-स्नान करे और भगवान् गदाधरका दर्शन करे तथा पंचामृत से उनको स्नान कराये एवं निम्न मन्त्र से यथाशक्ति उनका पूजन करे

नमस्ते वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय श्रीधराय च विष्णवे।

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कनखल तीर्थ को उत्तर व दक्षिण मानस तीर्थों के बीच में कहा गया है। अन्यत्र(स्कन्द पुराण 5.3.186) कहा गया है कि कनखल तीर्थ में सुपर्ण या गरुड ने विष्णु का वाहन बनने के लिए तप किया था। इससे संकेत मिलता है कि उत्तर व दक्षिण मानस तीर्थों को सुपर्ण के दो पक्ष कहा जा सकता है।

(श्येन चिति -- यह चित्र ज्योति अप्तोर्याम सोमयाग, 20 जनवरी 1फरवरी, गार्गेयपुरम्, कर्नूल के श्री राजशेखर शर्मा के संग्रह से लिया गया है)।

उत्तरान्मानसान्मौनी व्रजेद्दक्षिणमानसम्।

उदीचीतीर्थमित्युक्तं तत्रौदीच्यं विमुक्तिदम्।

अत्र स्नातो दिवं याति स्वशरीरेण मानवः॥2.49.6

मध्ये कनखलं तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।

स्नातः कनकवद्भाति नरो याति पवित्रताम्॥2.49.7

तस्य दक्षिणभागे च तीर्थं दक्षिणमानसम्।

अतः कनखलं लोके ख्यातं तीर्थमनुत्तमम्॥2.49.8

मानस तीर्थ क्या हो सकते हैं, इसके संदर्भ में कहा गया है कि मानस तीर्थ में अभीप्सित अर्थ की तुरन्त प्राप्त हो जाती है

चतुर्थे येऽपि वर्त्तन्ते महर्लोकं समाश्रिताः॥43

विज्ञेया मानसी तेषां सिद्धिर्वै पञ्चलक्षणा।

सद्यश्चोत्पद्यते तेषां मनसा सर्व्वमीप्सितम्॥ वायु 2.39.44

द्वितीया को मानस तीर्थों में सूर्य की अर्चना की जा रही है। तृतीया तिथि को अरण्य में साधना की जाएगी। इसका अर्थ होगा कि द्वितीया तिथि की साधना चेतन मन के स्तर पर है। तृतीया तिथि अचेतन मन के स्तर पर, अरण्य में साधना के लिए होगी।

 

अग्नि पुराण अध्याय 115 (मूल संस्कृत )

पहले दिन उत्तर-मानस-तीर्थ में स्नान करे | परम पवित्र उत्तर-मानस-तीर्थ में किया हुआ स्नान आयु और आरोग्य की वृद्धि, सम्पूर्ण पापराशियों का विनाश तथा मोक्ष की सिद्धि करनेवाला है; अत: वहाँ अवश्य स्नान करे | स्नान के बाद पहले देवता और पितर आदि का तर्पण करके श्राद्धकर्ता पुरुष पितरों को पिंडदान दे | तर्पण के समय यह भावना करे कि मैं स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूमिपर रहनेवाले सम्पूर्ण देवताओं को तृप्त करता हैं | स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूमि के देवता आदि एवं पिता-माता आदि का तर्पण करे | फिर इसप्रकार कहे पिता, पितामह और प्रपितामह; माता, पितामही और प्रपितामही तथा मातामह, प्रमातामह और वृद्ध प्रमातामह इन सबको तथा अन्य पितरों को भी उनके उद्धार के लिये मैं पिंड देता हूँ | सोम, मंगल और बुधस्वरुप तथा बृहस्पति, शुक्र, शनैश्वर, राहू और केतुरूप भगवान् सूर्य को प्रणाम है | उत्तर-मानस-तीर्थ में स्नान करनेवाला पुरुष अपने समस्त कुल का उद्धार कर देता है ||१०-१६||

सूर्यदेव को नमस्कार करके मनुष्य मौनभाव से दक्षिण-मानस-तीर्थ को जाय और यह भावना करे मैं पितरों की तृप्ति के लिये दक्षिण-मानस-तीर्थ में स्नान करता हूँ | मैं गया में इसी उद्देश्य से आया हूँ कि मेरे सम्पूर्ण पितर स्वर्गलोक को चले जायँ | तदनन्तर श्राद्ध और पिंडदान करके भगवान् सूर्य को प्रणाम करते हुए इसप्रकार कहे सबका भरण-पोषण करनेवाले भगवान् भानु को नमस्कार हैं | प्रभो ! आप मेरे अभ्युदय के साधक हों | मैं आपका ध्यान करता हूँ | आप मेरे सम्पूर्ण पितरों को भोग और मोक्ष देनेवाले हों | कव्यवाट, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद पदार्पण करें | आपलोगों के द्वारा सुरक्षित जो मेरे पिता-माता,पितामह आदि पितर हैं, उनको पिंडदान करने के उद्देश्य से मैं इस गयातीर्थ में आया हूँ | मुंडपृष्ठ के उत्तर भाग में देवताओं और ऋषियों से पूजित जो कनखल नामक तीर्थ है, वह तीनों लोकों में विख्यात है | सिद्ध पुरुषों के लिये आनंददायक और पापियों के लिये भयंकर बड़े-बड़े नाग, जिनकी जीभ लपलपाती रहती है, उस तीर्थ की प्रतिदिन रक्षा करते हैं | वहाँ स्नान करके मनुष्य इस भूतलपर सुखपूर्वक क्रीडा करते और अंत में स्वर्गलोक को जाते हैं ||१७-२४||

 

सत्यतीर्थं क्षमातीर्थं तीर्थमिंद्रियनिग्रहः ।। सर्वभूतदयातीर्थं तीर्थानां सत्यवादिता ।। ४६ ।।

ज्ञानतीर्थं तपस्तीर्थं कथितं तीर्थसप्तकम् ।। सर्वभूतदयातीर्थे विशुद्धिर्मनसो भवेत्।। ४७ ।।

-    स्कन्द पु. 2.8.10.43

सत्यं तीर्थं क्षमा तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः ।। सर्वभूतदयातीर्थं तीर्थमार्जवमेव च ।। ३० ।।

दानं तीर्थं दमस्तीर्थं संतोषस्तीर्थमुच्यते ।। ब्रह्मचर्यं परं तीर्थं तीर्थं च प्रियवादिता ।। ३१ ।।

ज्ञानं तीर्थं धृतिस्तीर्थं तपस्तीर्थमुदाहृतम् ।। तीर्थानामपि तत्तीर्थं विशुद्धिर्मनसः परा ।।स्कन्द 4.1.6.३२ ।।

 

स्कन्द पुराण 4.2.70.20 में इष कृष्ण द्वितीया में ललिता देवी की आराधना का निर्देश है। जिह्वालोल तीर्थ और ललिता में साम्य हो सकता है। ब्रह्माण्ड पुराण में ललिता देवी भण्डासुर का वध करती है। भण्ड को अनियन्त्रित आह्लाद, विकृत हास्य की स्थिति के रूप में समझ सकते हैं। सबसे पहली स्थिति है अपने विकारों को भून डालने की, जिससे वे पुनः अंकुरित न हों। दूसरा चरण है रस को महत्त्व देना, जीवन में उतरना। लेकिन साथ ही साथ आह्लाद को अनियन्त्रित नहीं होने देना है। यह उत्तरमानस और दक्षिणमानस तीर्थ हो सकते हैं।

वायु पुराण का विवरण

आदौ तु पञ्चतीर्थेषु चोत्तरे मानसे विधिः। आचम्य कुशहस्तेन शिरश्चाभ्युक्ष्य वारिणा॥1॥ उत्तरं मानसं गच्छेन्मन्त्रेण स्नानमाचरेत्। उत्तरे मानसे स्नानं करोम्यात्मविशुद्धये॥2॥ सूर्य्यलोकादिसंसिद्धिसिद्धये पितृमुक्तये। देवादींस्तर्पयित्वाथ श्राद्धं कुर्यात् सपिण्डकम्॥3॥ मानसं हि सरो ह्यत्र तस्मादुत्तरमानसम्। सूर्य्यं नत्वार्च्चयित्वाथ सूर्य्यलोकं नयेत्पितॄन्॥4॥ नमो भगवते भर्त्रे सोमभौमज्ञरूपिणे। जीवभार्गवसौरेयराहुकेतुस्वरूपिणे॥5॥ उत्तरान्मानसान्मौनी व्रजेद्दक्षिणमानसम्। उदीचीतीर्थमित्युक्तं तत्रौदीच्यं विमुक्तिदम्। अत्र स्नातो दिवं याति स्वशरीरेण मानवः॥6॥ मध्ये कनखलं तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्। स्नातः कनकवद्भाति नरो याति पवित्रताम्॥7॥ तस्य दक्षिणभागे च तीर्थं दक्षिणमानसम्। अतः कनखलं लोके ख्यातं तीर्थमनुत्तमम्॥8॥ दक्षिणे मानसे चैव तीर्थत्रयमुदाहृतम्। स्नात्वा तेषु विधानेन कुर्य्याच्छ्राद्धं पृथक्पृथक्॥9॥ दक्षिणे मानसे स्नानं करोम्यात्मविशुद्धये।

सूर्य्यलोकादिसंसिद्धिसिद्धये पितृमुक्तये॥10॥ ब्रह्महत्यादिपापौघ यातनाया विमुक्तये।

दिवाकर करोमीह स्नानं दक्षिणमानसे॥11॥ नमामि सूर्य्यं तृप्त्यर्थं पितॄणां तारणाय च। पुत्रपौत्रधनैश्वर्य्यायायुरारोग्य वृद्धये॥12॥ अनेन स्नानपूजादि कृत्वा श्राद्धं सपिण्डकम्। कृत्वा नत्वा च मौन्यर्कमिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥13॥ - वायु पुराण 2.49/111

 

चतुर्थे येऽपि वर्त्तन्ते महर्लोकं समाश्रिताः॥43॥ विज्ञेया मानसी तेषां सिद्धिर्वै पञ्चलक्षणा। सद्यश्चोत्पद्यते तेषां मनसा सर्व्वमीप्सितम्॥44॥ एते दैवा यजन्ते वै यज्ञैः सर्वैः परस्परम्। अतीतान् वर्तमानांश्च वर्त्तमानाननागतान्॥45॥ - वायु पुराण 2.39/101

 

अगस्त्य उवाच। शृणु तीर्थानि गदतो मानसानि ममानघे। येषु सम्यङ् नरः स्नात्वा प्रयाति परमां गतिम्॥29॥ सत्यं तीर्थं क्षमा तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः। सर्वभूतदयातीर्थं तीर्थमार्जवमेव च॥30॥ दानं तीर्थं दमस्तीर्थं संतोषस्तीर्थमुच्यते। ब्रह्मचर्यं परं तीर्थं तीर्थं च प्रियवादिता॥31॥ ज्ञानं तीर्थं धृतिस्तीर्थं तपस्तीर्थमुदाहृतम्। तीर्थानामपि तत्तीर्थं विशुद्धिर्मनसः परा॥32॥ - स्कन्द पुराण 4.1.6, 2.8.10.45

 

तृतीया तिथि

सरस्वती स्नान, मतंगवापी, धर्मारण्य और बोधगया में श्राद्ध

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पितृपक्ष के तृतीया तिथि को बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर, सरस्वती, मातंगवापी व धर्मारण्य पिंडवेदियों पर पिंडदान का विधान है। पंचकोसी गया क्षेत्र के तहत बोधगया के सरस्वती (मुहाने) नदी में तर्पण, धर्मारण्य व मातंगवापी पिंडवेदी में पिंडदान व महाबोधि मंदिर में दर्शन की परंपरा कालांतर से चली आ रही है। जिसका निर्वहन पितृपक्ष के तृतीया तिथि को श्राद्ध कर्म कांड करने वाले आस्थावानों की भीड़ धर्मारण्य, मांतगवापी व महाबोधि मंदिर मे रविवार को उमड़ी। लेकिन सरस्वती पिंडवेदी पर विरानी छायी रही। सरस्वती पिंडवेदी पर होने वाले तर्पण के विधान को पंडा-पुजारी धर्मारण्य के समीप ही मुहाने नदी में संपन्न कराए। क्योंकि सरस्वती पिंडवेदी आज भी पूर्णतया उपेक्षित है। आवागमन के लिए मार्ग सुलभ न होने के कारण तीर्थ यात्री वहां तक पहुंच नहीं पाते। फिर भी तर्पण, पिंडदान व दर्शन का सिलसिला बोधगया के पिंडवेदियों पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक चला।

मुहाने नदी में स्नान व तर्पण के पश्चात तीर्थ यात्री धर्मारण्य पिंडवेदी पर पहुंच रहे थे जहां पूर्व से ही पंडा-पुजारी के सेवक यजमान के बैठने के लिए जगह की व्यवस्था कर रखे हैं। वहां यजमान परंपरा के अनुसार श्रद्धा पूर्वक अपने पूर्वजों को याद कर पिंडदान के विधान को संपन्न कर पिंड को धर्मारण्य मंडप में बने अष्टकमल आकार के कूप में छोड़ते हैं। वहीं, कई ऐसे तीर्थ यात्री भी थे जो प्रेत बाधा से मुक्ति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध कर धर्मारण्य परिसर में बने अष्टकमल आकार के दूसरे कूप में नारियल छोड़ रहे थे। यहां के बाद तीर्थ यात्री मातंगवापी पिंडवेदी पहुंचते हैं। यहां तीर्थ यात्री अपने पूर्वजों के मोक्ष के लिए किए पिंडदान को मातंगेश शिव पर छोड़ते हैं।

 

 

 


 

वायु पुराण के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने महाबोधि मंदिर में धर्म नामक शंकर व बोधिवृक्ष को नमस्कार पिंडदान करने के पश्चात किया था। और स्कंद पुराण के अनुसार धर्मारण्य में महाभारत युद्ध में जाने-अंजाने मारे गए लोगों के आत्मा की शांति के लिए धर्मराज युधिष्ठिर ने पिंडदान किया था। महाबोधि मंदिर के मुचलिंद सरोवर का क्षेत्र तीर्थ यात्रियों से पटा है। सभी अपने पितरों के मोक्ष की कामना से पिंडदान के विधान करने में लगे हैं। पंडा-पुजारी मंत्र का जोर-जोर से उच्चारण कर रहे हैं। भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान बुद्ध का जयकारा भी विधान समाप्त होने पर ताली बजाकर तीर्थ यात्री लगाते हैं। उसके बाद मंदिर के गर्भगृह में भगवान बुद्ध का दर्शन व पवित्र बोधिवृक्ष को नमन कर अगले पड़ाव की ओर रवाना होते हैं।

चौथे दिनका कृत्य (गया श्राद्ध पद्धति, गीताप्रेस, गोरखपुर)

चौथे दिन आश्विनकृष्ण तृतीया को सरस्वती स्नान, मतंगवापी, धर्मारण्य और बोधगया में श्राद्ध होता है। प्रातः फल्गुतीर्थ में स्नान, तर्पण करके संकल्पपूर्वक धर्मारण्यतीर्थ में जाय। मार्ग में सरस्वती तीर्थ पर मार्जन-स्नान, तर्पण करके ब्राह्मण को पंचरत्न का दान करे और देवी सरस्वती का दर्शन करे। तदनन्तर मतंगवापी जाकर तीर्थ को प्रणाम कर वहाँ श्राद्ध करे। तत्पश्चात् निम्न मन्त्र से मतंगवापी के उत्तर में स्थित मतंगेश्वर को प्रणाम करे

प्रमाणं देवता सन्तु लोकपालाश्च साक्षिणः ।

मयागत्य मतङ्गेऽस्मिन्पितॄणां निष्कृतिः कृता ।

धर्मारण्य में जाकर ब्रह्मतीर्थसंज्ञक ब्रह्मकूप में श्राद्ध करे। तदनन्तर धर्मराज एवं धर्मेश्वर को प्रणाम करे। इसके बाद बोधगया में जाकर महाबोधि वृक्ष के नीचे अपने तथा समस्त पितरों के उद्धार की कामना से श्राद्ध करे। तदनन्तर निम्न मन्त्रों से नारायणरूप बोधिवृक्ष को श्रद्धाभक्तिपूर्वक प्रणाम करे

चलद्दलाय वृक्षाय सर्वदा स्थितिहेतवे। बोधितत्त्वाय यज्ञाय अश्वत्थाय नमो नमः ।

एकादशोऽसि रुद्राणां वसूनां पावकस्तथा। नारायणोऽसि देवानां वृक्षराजोऽसि पिप्पल॥

अश्वत्थ यस्मात्त्वयि वृक्षराज नारायणास्तिष्ठति सर्वकालम्।

अतः शुभस्त्वं सततं तरूणां धन्योऽसि दुःस्वप्नविनाशनोऽसि ।

बोधिरूपं महावृक्षं नारायणमनःप्रियम्। त्वां नमामि महावृक्ष पितृभ्यो निष्कृतिं कुरु ।

येऽस्मत्कुले मातृवंशे बान्धवाः दुर्गतिं गताः।

त्वद्दर्शनात्स्पर्शनाच्च स्वर्गतिं यान्तु तेऽक्षयाम्॥

ऋणत्रयं मया दत्तं गयामागत्य वृक्षराट् ।

त्वत्प्रसादान्महापापाद् विमुक्तोऽहं भवार्णवात्॥

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तृतीया तिथि को किए जाने व्रतों में से एक गौरी तृतीया व्रत है। कथा इस प्रकार है कि दक्ष ने शिव को जो कन्या प्रदान की थी, वह काली थी। कालांतर में काली अग्नि में भस्म हो गई और फिर हिमालय की पुत्री गौरी के रूप में उत्पन्न हुई। इस कथा से संकेत मिलता है कि प्रकृति में जो तमोगुण, कालापन विद्यमान है, उसका नाश करना है। इस तमोगुण का कारण माता भी हो सकती है, पिता भी। धर्मारण्य का उल्लेख यह संकेत करता है कि अचेतन मन को चेतन रूप में जितना भी रूपान्तरित किया जा सकता था, वह कार्य द्वितीया तिथि को सम्पन्न हो चुका है। अब बारी है उस अचेतन मन की जो रूपान्तरण का नाम ही नहीं लेता, जो अरण्य है, जहां हिंसक वृत्तियां विद्यमान हैं। धर्मारण्य का वृत्तान्त स्कन्द पुराण ब्रहमखण्ड में प्राप्त होता है। इस स्थान पर यम ने यमलोक से आकर तप किया था। और तप के पश्चात् इस स्थान को ग्राम्य बनाने के लिए यहां 18 गोत्रों के वेदज्ञ ब्राह्मणों को लाकर बसाया था। उनकी सहायता के लिए 36 गोत्रों के वैश्यों को बसाया था। लेकिन कालन्तर में यह सभी किसी न किसी कारण से नष्ट हो जाते थे और उनको पुनः पुनः बसाया गया।

     धर्मारण्य के कूप का क्या महत्त्व हो सकता है, इस सम्बन्ध में कथासरित्सागर की एक कथा उल्लेखनीय है। एक राजा ने जब धर्मारण्य कूप पर पिण्डदान करना चाहा तो कूप से तीन हाथ प्रकट हो गए- एक चोर का हाथ जो लोहमय शंकु रूप था। दूसरा ब्राह्मण का जिसने पवित्र ले रखा था। तीसरा राजा का जिसमें अंगूठी पहनी थी। राजा के सामने प्रश्न आया कि वह किस हाथ को अपना पिता मान कर पिण्ड दान करे। कथा कहती है कि राजा को चोर के हाथ में पिण्डदान करना चाहिए। इसका कारण यह है कि चोर को शूल पर लटकाया गया था। उसी काल में चोर ने अपना धन देकर एक कन्या को अपनी पत्नी बनाने के लिए राजी कर लिया और कहा कि वह कन्या जिससे भी पुत्र उत्पन्न करेगी, वह चोर का पुत्र माना जाएगा। कालांतर में कन्या एक विप्र युवक को धन देकर उससे पुत्र उत्पन्न करती है। वह पुत्र एक राजा का दत्तक पुत्र बन जाता है। इस कथा का मह्त्त्व इसलिए अधिक हो जाता है क्योंकि स्कन्द पुराण में शूलभेद तीर्थ की तुलना गयाकूप से की गई है

गया नाभ्यां यथा पुण्या चक्रतीर्थं च तत्समम्  ॥ ४४.१७ ॥

धर्मारण्ये यथा कूपं शूलभेदं च तत्समम्  ।

ब्रह्मयूपं यथा पुण्यं देवनद्यास्तथैव च  ॥ ४४.१८ ॥

कथा का निहितार्थ यह हो सकता है कि हम ईश्वर प्रदत्त धनों की चोरी कर रहे हैं, उसके वास्तविक अधिकारी नहीं हैं। लेकिन चोरी से प्राप्त धन का भी सदुपयोग किया जा सकता है और उससे क्रीत पुत्र को उत्पन्न किया जा सकता है जिसे पिण्डदान का, चेतना को पिण्डित करने का, घनीभूत करने का अधिकार होगा।

श्री रवीन्द्र पाठक के ब्लांग के अनुसार धर्मारण्य में पिण्डदान कृत्य का अधिकार श्रोत्रिय ब्राह्मण को है, जबकि मतंगवापी में मग ब्राह्मण को। मतंगवापी में पिण्डदान से क्या तात्पर्य हो सकता है, यह मतङ्गोपाख्यान से स्पष्ट है।

मतङ्गोपाख्यानम् (संस्कृत)

 महाभारत अनुशासन पर्व 27-29

मतङ्गोपाख्यानम् (संस्कृत)

युधिष्ठिरने पूछाधर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश्वर ! आप बुद्धि, विद्या, सदाचार, शील और विभिन्न प्रकार के सम्पूर्ण सद्गुणों से सम्पन्न हैं । आपकी अवस्था भी सबसे बड़ी है। आप बुद्धि, प्रज्ञा और तपस्या से विशिष्ट हैं; अतः मैं आपसे धर्म की बात पूछता हूँ । संसारमें आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जिससे सब प्रकारके प्रश्न पूछे जा सकें ॥१-२॥ नृपश्रेष्ठ ! यदि क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र ब्राह्मणत्व प्राप्त करना चाहे तो वह किस उपाय से उसे पा सकता है ? यह मुझे बताइये ॥ ३ ॥ पितामह ! यदि कोई ब्राह्मणत्व पाने की इच्छा करे तो वह उसे तपस्या, महान् कर्म अथवा वेदों के स्वाध्याय आदि किस उपाय से प्राप्त कर सकता है ? ॥ ४ ॥ भीष्म जी ने कहा-तात युधिष्ठिर ! क्षत्रिय आदि तीन वर्णो के लिये ब्राह्मणत्व प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि यह समस्त प्राणियों के लिये सर्वोत्तम स्थान है ॥ ५ ॥ तात ! बहुत-सी योनियों में बारंबार जन्म लेते-लेते कभी किसी समय संसारी जीव ब्राह्मण की योनि में जन्म लेता है॥६॥ युधिष्ठिर ! इस विषयमें जानकार मनुष्य मतङ्ग और गर्दभी के संवादरूप इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं ॥ ७ ॥ तात ! पूर्वकालमें किसी ब्राह्मण के एक मतङ्ग नामक पुत्र हुआ, जो (अन्य वर्णके पुरुष से उत्पन्न होने पर भी ब्राह्मणोचित संस्कारों के प्रभाव से) उनके समान वर्ण का ही समझा जाता था, वह समस्त सद्गुणों से सम्पन्न था ॥ ८ ॥ शत्रुओं को संताप देने वाले कुन्तीकुमार ! एक दिन अपने पिता के भेजने पर मतङ्ग किसी यजमान का यज्ञ कराने के लिये गधौ से जुते हुए शीघ्रगामी रथपर बैठकर चला ॥ ९ ॥ राजन् ! रथ का बोझ ढोते हुए एक छोटी अवस्था के गधे को उसकी माता के निकट ही मतङ्ग ने बारंबार चाबुक से मारकर उसकी नाक में घाव कर दिया ॥ १० ॥पुत्र का भला चाहने वाली गधी उस गधे की नाक में दुस्सह घाव हुआ देख उसे समझाती हुई बोली-बेटा ! शोक न करो । तुम्हारे ऊपर ब्राह्मण नहीं, चाण्डाल सवार है ॥ ब्राह्मण में इतनी क्रूरता नहीं होती। ब्राह्मण सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला बताया जाता है। जो समस्त प्राणियों को उपदेश देनेवाला आचार्य है, वह कैसे किसी पर करेगा ? ।। १२ ।। यह स्वभाव से ही पापात्मा है; इसीलिये दूसरे के बच्चे पर दया नहीं करता है। यह अपने इस कुकृत्य द्वारा अपनी चाण्डाल योनि का ही सम्मान बढ़ा रहा है। जातिगत स्वभाव ह्री मनोभाव पर नियन्त्रण करता है ॥ १३ ॥ गधी का यह दारुण वचन सुनकर मतङ्ग तुरंत रथ से उतर पड़ा और गधी से इस प्रकार बोला-॥ १४ ॥ कल्याणमयी गर्दभी ! बता, मेरी माता किससे कलङ्कित हुई है ? तू मुझे चाण्डाल कैसे समझती है ? शीघ्र मुझसे सारी बात बता ॥ १५ ॥ गधी ! तुझे कैसे मालूम हुआ कि मैं चाण्डाल हूँ । किस कर्म से मेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हुआ है ? तू बड़ी समझदार है; अतः ये सारी बातें मुझे ठीक-ठीक बता ॥ १६ ॥ गदही बोली-मतङ्ग ! तू यौवन के मद से मतवाली हुई एक ब्राह्मणी के पेट से शूद्रजातीय नाई द्वारा पैदा किया गया, इसीलिये तू चाण्डाल है और तेरी माता के इसी व्यभिचार कर्म से तेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया है ॥ १७ ॥ गदहीके ऐसा कहने पर मतङ्ग फिर अपने घर को लौट गया। उसे लौटकर आया देख पिता ने इस प्रकार कहा-॥ १८॥ बेटा ! मैंने तो तुम्हें यज्ञ कराने के भारी कार्य पर लगा रखा था, फिर तुम लौट कैसे आये ? तुम कुशल से तो हो न ? ।। १९ ।। मतङ्ग ने कहा-पिताजी ! जो चाण्डाल योनि में उत्पन्न हुआ है अथवा उससे भी नीच योनि में पैदा हुआ है, वह कैसे सकुशल रह सकता है । जिसे ऐसी माता मिली हो, उसे कहाँ से कुशल प्राप्त होगी ॥ २० ॥ पिताजी ! यह मानवेतर योनि में उत्पन्न हुई गदही मुझे ब्राह्मणी के गर्भ से शूद्र द्वारा पैदा हुआ बता रही है; इसलिये अब मैं महान् तप में लग जाऊँगा ॥ २१ ॥ पिता से ऐसा कहकर मतङ्ग तपस्या के लिये दृढ़ निश्चय करके घर से निकल पड़ा और एक महान् वन में जाकर वहाँ बडी भारी तपस्या करने लगा ॥ २२ ॥ तपस्या में संलग्न हो मतङ्ग ने देवताओं को संतप्त कर दिया । वह भलीभाँति तपस्या करके सुख से ही ब्राह्मणत्वरूपी अभीष्ट स्थान को प्राप्त करना चाहता था ॥ २३ ॥ उसे इस प्रकार तपस्या में संलग्न देख इन्द्र ने कहा -- मतङ्ग ! तुम क्यों मानवीय भोगों का परित्याग करके तपस्या कर रहे हो ? ॥ २४ ॥ मैं तुम्हें वर देता हूँ । तुम जो चाहते हो, उसे प्रसन्नतापूर्वक माँग लो । तुम्हारे हृदय में जो कुछ पाने की अभिलाषा है, वह् सब शीघ्र बताओ ।। २५ ।। मतङ्ग ने कहा-मैंने ब्राह्मणत्व प्राप्त करने की इच्छा से यह तपस्या प्रारम्भ की है। उसे पा करके ही यहाँ से जाऊँ, मैं यही वर चाह्ता हूँ ॥ २६ ॥ भीष्म जी कहते हैं-भारत ! मतङ्ग की यह बात सुनकर इन्द्रदेव ने कहामतङ्ग ! तुम जो ब्राह्मणत्व माँग रहे हो, यह तुम्हारे लिये दुर्लभ है ॥ २७ ॥ जिनका अन्त:करण शुद्ध नहीं है अथवा जो पुण्यात्मा नहीं हैं, उनके लिये ब्राह्मणत्व की प्राप्ति असम्भव है। दुर्बुद्धे ! तुम ब्राह्मणत्व माँगते-माँगते मर जाओगे तो भी वह नहीं मिलेगा; अतः इस दुराग्रह से जितना शीघ्र सम्भव हो निवृत्त हो जाओ ॥ २८ ॥ सम्पूर्ण भूतों में श्रेष्ठता ही ब्राह्मणत्व है और यही तुम्हारा अभीष्ट प्रयोजन है, परंतु यह तप उस प्रयोजन को सिद्ध नहीं कर सकता; अतः इस श्रेष्ठ पद की अभिलाषा रखते हुए तुम शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे ॥ २९ ॥ देवताओं, असुरों और मनुष्यों में भी जो परम पवित्र माना गया है, उस ब्राह्मणत्व को चाण्डालयोनि में उत्पन्न हुआ मनुष्य किसी तरह नहीं पा सकता ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि इन्द्रमतङ्गसंवादे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

भीष्मजी कहते हैं-राजन्! इन्द्र के ऐसा कहने पर मतङ्ग का मन और भी दृढ़ हो गया । वह संयमपूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने लगा। अपने धैर्य से च्युत न होनेवाला मतङ्ग सौ वर्षों तक एक पैर से खड़ा रहा ॥ १ ॥ तब महायशस्वी इन्द्र ने पुनः आकर उससे कहा- तात ! ब्राह्मणत्व दुर्लभ है । उसे माँगने पर भी पा न सकोगे ॥ २ ॥ मतङ्ग ! तुम इस उत्तम स्थान को माँगते-मोंगते मर जाओगे । बेटा ! दु:साहस न करो । तुम्हारे लिये यह धर्म का मार्ग नहीं है ॥ ३ ॥ दुर्मते ! तुम इस जीवन में ब्राह्मणत्व नहीं पा सकते । उस अप्राप्य वस्तु के लिये प्रार्थना करते-करते शीघ्र ही काल के गाल में चले जाओगे ॥ ४ ॥ मतङ्ग ! मैं तुम्हें बार-बार मना करता हूँ तो भी उस उत्कृष्ट स्थान को तुम तपस्या द्वारा प्राप्त करने की अभिलाषा करते ही जाते हो । ऐसा करने से सर्वथा तुम्हारी सत्ता मिट जायगी ॥ ५ ॥ पशु-पक्षी की योनि में पड़े हुए सभी प्राणी यदि कभी मनुष्ययोनि में जाते हैं तो पहले पुल्कस या चाण्डाल के रूप में जन्म लेते हैं-इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥ मतङ्ग ! पुल्कस या जो कोई भी पापयोनि पुरुष यहाँ दिखायी देता है, वह सुदीर्घकाल तक अपनी उसी योनि में चक्कर लगाता रहता है ॥ ७ ॥ तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतने पर वह चाण्डाल या पुल्कस शूद्र योनि में जन्म लेता है और उसमें भी अनेक जन्मों तक चक्कर लगाता रहता है ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् तीस गुना समय बीतने पर वह वैश्य योनि में आता है और चिरकाल तक उसी में चक्कर काटता रहता है ॥ ९ ॥ इसके बाद साठ  गुना समय बीतने पर वह क्षत्रिय की योनि में जन्म लेता है। फिर उससे भी साठ गुना समय बीतने पर वह गिरे हुए ब्राह्मण के घर में जन्म लेता है ॥ १० ॥दीर्घकाल तक ब्राह्मणाधम रहकर जब उसकी अवस्था परिवर्तित होती है, तब वह अस्त्र-शस्त्रों से जीविका चलाने वाले ब्राह्मण के यहाँ जन्म लेता है॥ ११ ॥ फिर चिरकाल तक वह उसी योनि में पड़ा रहता है। तदनन्तर तीन सौ वर्ष का समय व्यतीत होने पर वह गायत्री  मात्र का जप करने वाले ब्राह्मण के यहाँ जन्म लेता है ॥ १२ ॥ उस जन्म को पाकर वह चिरकाल तक उसी योनि में जन्मता-मरता रहता है। फिर चार सौ वर्षों का समय व्यतीत होनेपर वह श्रोत्रिय ( वेदवेत्ता ) ब्राह्मण के कुल में जन्म लेता है और उसी कुल में चिरकाल तक उसका आवागमन होता रहता है ॥ १३ ॥ बेटा ! इस प्रकार शोक-हर्ष, राग-द्वेष, अतिमान और अतिवाद आदि दोषों का अधम द्विजके भीतर प्रवेश होता है॥ १४ ॥ यदि वह इन शत्रुओंको जीत लेता है तो सद्गति को प्राप्त होता है और यदि वे शत्रु ही उसे जीत लेते हैं तो ताड़ के वृक्षके ऊपर से गिरने वाले फल की भाँति वह नीचे गिरा दिया जाता है ॥ १५ ॥ मतङ्ग ! यही सोचकर मैंने तुमसे कहा था कि तुम कोई दूसरी अभीष्ट वस्तु माँग लो; क्योंकि ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि  इन्द्रमतङ्गसंवादे अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

भीष्म जी कहते हैं-युधिष्ठिर ! इन्द्र के ऐसा कहने पर मतङ्ग अपने मन को और भी दृढ़ और संयमशील बनाकर एक हजार वर्षों तक एक पैर से ध्यान लगाये खड़ा रहा ॥ १ ॥ जब एक हजार वर्ष पूरे होने में कुछ ही काल बाकी था, उस समय बल और वृत्रासुर के शत्रु देवराज इन्द्र फिर मतङ्ग को देखने के लिये आये और पुनः उससे उन्होंने पहले की कही डुई बात ही दुहरायी ॥ २ ॥ मतङ्ग ने कहा-देवराज ! मैंने ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक एकाग्रचित हो एक हजार वर्षों तक एक पैर से खड़ा होकर तप किया है। फिर मुझे ब्राह्मणत्व कैसे नहीं प्राप्त हो सकता?॥ इन्द्रने कहा--मतङ्ग ! चाण्डाल की योनि में जन्म लेने वाले को किसी तरह ब्राह्मणत्व नहीं मिल सकता; इसलिये तुम दूसरी कोई अभीष्ट वस्तु माँग लो  जिससे तुम्हारा यह _काम व्यर्थ न जाय ।। ४ ।। उनके ऐसा कहने पर मतङ्ग अत्यन्त शोकमग्न हो गया में जाकर अंगूठे के बलपर सौ वर्षों तक खड़ा रहा ॥ ५ ॥ उसने दुर्धर योग का अनुष्ठान किया । उसका सारा शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया । नस-नाड़ियाँ उघड़ आयीं । धर्मात्मा मतङ्ग का शरीर चमड़े से ढकी हुई हड्डियों का ढाँचामात्र रह गया । उस अवस्था में अपने को न संभाल सकने के कारण वह गिर पड़ा, यह बात हमारे सुनने में आयी है॥६॥ उसे गिरते देख सम्पूर्ण भूतों के हित में तत्पर रहनेवाले वर देने में समर्थ इन्द्र ने दौड़कर पकड़ लिया ॥ ७ ॥ इन्द्र ने कहा-मतङ्ग ! इस जन्म में तुम्हारे लिये ब्राह्मणत्व की प्राप्ति असम्भव दिखायी देती है । ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है; साथ ही वह कामक्रोध आदि लुटेरों से घिरा हुआ है ॥ ८ ॥ जो ब्राह्मण का आदर करता है, वह सुख पाता है और जो अनादर करता है, वह दु:ख पाता है । ब्राह्मण समस्त प्राणियों को योगक्षेम की प्राप्ति कराने वाला है ॥ ९ ॥ मतङ्ग ! ब्राह्मणों के तृप्त होने से ही देवता और पितर भी तृप्त होते हैं। ब्राह्मण को समस्त प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है। ब्राह्मण जो-जो जिस प्रकार करना चाहता है, अपने तप के प्रभाव से वैसा ही कर सकता है। तात ! जीव इस जगत् के भीतर अनेक योनियों में भ्रमण करता हुआ बारंबार जन्म लेता है । इसी तरह जन्म लेते-लेते कभी किसी समय में वह ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥ अतः जिनका मन अपने वश में नहीं है, ऐसे लोगों के लिये सर्वथा दुष्प्राप्य ब्राह्मणत्व को पाने का आग्रह छोड़कर तुम कोई दूसरा ही वर माँगो । यह वर तो तुम्हारे लिये दुर्लभ ही है ॥ १२ ॥ मतङ्ग ने कहा-देवराज ! मैं तो यों ही दुःख से आतुर हो रहा हूँ, फिर तुम भी क्यों मुझे पीड़ा दे रहे हो ? मुझ मरे हुए को क्यों मारते हो ? मैं तो तुम्हारे लिये शोक करता हूँ, जो जन्म से ही ब्राह्मणत्व को पाकर भी तुम उसे अपना नहीं रहे हो ॥ १३ ॥शतक्रतो । यदि क्षत्रिय आादि तीन वर्णो के लिये ब्राह्मणत्व दुर्लभ है तो उस परम दुर्लभ ब्राह्मणत्व को पाकर भी मनुष्य ब्राह्मणोचित शम-दम का अनुष्ठान नहीं करते हैं । यह कितने दुःख की बात है ! ॥ १४ ॥ वह पापियों से भी बढ़कर अत्यन्त पापी और उनमें भी अधम ही है, जो दुर्लभ धन की भाँति ब्राह्मणत्व को पाकर भी उसके महत्त्व को नहीं समझता है॥ १५ ॥ पहले तो ब्राह्मणत्व का प्राप्त होना ही कठिन है । यदि वह प्राप्त हो जाय तो उसका पालन करना और भी कठिन हो जाता है; किंतु बहुत से मनुष्य इस दुर्लभ वस्तु को पाकर भी तदनुकूल आचरण नहीं करते हैं ॥ १६॥ शक्र ! मैं एकान्त में आनन्दपूर्वक रहता हूँ तथा द्वन्द्वों और परिग्रहों से दूर हूँ। अहिंसा और दम का पालन किया करता हूँ। ऐसी दशा में मैं ब्राह्मणत्व पाने योग्य क्यों नहीं हूँ ? ॥ पुरंदर ! मैं धर्मज्ञ होकर भी केवल माता के दोष से इस अवस्था में आ पहुँचा हूँ। यह मेरा कैसा दुर्भाग्य है ? प्रभो ! निश्चय ही पुरुषार्थ के द्वारा दैव का उल्लङ्घन्  नहीं किया जा सकता; क्योंकि मैं जिसके लिये ऐसा प्रयत्नशील हूँ, उस ब्राह्मणत्व को नहीं उपलब्ध कर पाता हूँ । धर्मज्ञ देवराज ! यदि ऐसी अवस्था में मैं आपका कृपापात्र हूँ अथवा यदि मेरा कुछ भी पुण्य शेष हो तो आप मुझे वर प्रदान कीजिये ॥ २० ॥ वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय ! तब बल और वृत्रासुर को मारने वाले इन्द्र ने मतङ्क से कहा-तुम मुझसे वर माँगो। महेन्द्र से प्रेरित होकर मतङ्ग ने इस प्रकार कहा-॥२१ ।। देव पुरंदर ! आप ऐसी कृपा करें, जिससे मैं इच्छानुसार विचरने वाला तथा अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाला आकाशचारी देवता होऊँ । ब्राह्मण और क्षत्रियों के विरोध से रहित हो मैं सर्वत्र पूजा एवं सत्कार प्राप्त करूँ तथा मेरी अक्षय कीर्ति का विस्तार हो । मैं आपके चरणों में मस्तक रखकर आपकी प्रसन्नता चाहता हूँ । आप मेरी इस प्रार्थना सफल बनाईये। इन्द्र ने कहा- वत्स ! तुम स्त्रियों के पूजनीय होओगे । । छन्दोदेव के नाम से तुम्हारी ख्याति होगी और तीनों लोकों में  तुम्हारी अनुपम कीर्ति का विस्तार होगा ॥ २४ ॥ इस प्रकार उसे वर देकर इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गये। मतङ्ग भी अपने प्राणों  का परित्याग करके उत्तम स्थान ( ब्रह्म लोक) को प्राप्त हुआ ॥ २५ ॥ भारत ! इस तरह यह ब्राह्मणत्व परम उत्तम स्थान है। जैसा कि इन्द्र का कथन है, उसके अनुसार यह इस जीवन में दूसरे वर्ण के लोगों के लिये दुर्लभ है ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि इन्द्रमतङ्गसंवादे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥

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