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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(Shamku - Shtheevana)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

 

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Shamku -  Shankushiraa  ( words like Shakata/chariot, Shakuna/omens, Shakuni, Shakuntalaa, Shakti/power, Shakra, Shankara, Shanku, Shankukarna etc. )

Shankha - Shataakshi (Shankha, Shankhachooda, Shachi, Shanda, Shatadhanvaa, Shatarudriya etc.)

Shataananda - Shami (Shataananda, Shataaneeka, Shatru / enemy, Shatrughna, Shani / Saturn, Shantanu, Shabara, Shabari, Shama, Shami etc.)

Shameeka - Shareera ( Shameeka, Shambara, Shambhu, Shayana / sleeping, Shara, Sharada / winter, Sharabha, Shareera / body etc.)

Sharkaraa - Shaaka   (Sharkaraa / sugar, Sharmishthaa, Sharyaati, Shalya, Shava, Shasha, Shaaka etc.)

Shaakataayana - Shaalagraama (Shaakambhari, Shaakalya, Shaandili, Shaandilya, Shaanti / peace, Shaaradaa, Shaardoola, Shaalagraama etc.)

Shaalaa - Shilaa  (Shaalaa, Shaaligraama, Shaalmali, Shaalva, Shikhandi, Shipraa, Shibi, Shilaa / rock etc)

Shilaada - Shiva  ( Shilpa, Shiva etc. )

Shivagana - Shuka (  Shivaraatri, Shivasharmaa, Shivaa, Shishupaala, Shishumaara, Shishya/desciple, Sheela, Shuka / parrot etc.)

Shukee - Shunahsakha  (  Shukra/venus, Shukla, Shuchi, Shuddhi, Shunah / dog, Shunahshepa etc.)

Shubha - Shrigaala ( Shubha / holy, Shumbha, Shuukara, Shoodra / Shuudra, Shuunya / Shoonya, Shoora, Shoorasena, Shuurpa, Shuurpanakhaa, Shuula, Shrigaala / jackal etc. )

Shrinkhali - Shmashaana ( Shringa / horn, Shringaar, Shringi, Shesha, Shaibyaa, Shaila / mountain, Shona, Shobhaa / beauty, Shaucha, Shmashaana etc. )

Shmashru - Shraanta  (Shyaamalaa, Shyena / hawk, Shraddhaa, Shravana, Shraaddha etc. )

Shraavana - Shrutaayudha  (Shraavana, Shree, Shreedaamaa, Shreedhara, Shreenivaasa, Shreemati, Shrutadeva etc.)

Shrutaartha - Shadaja (Shruti, Shwaana / dog, Shweta / white, Shwetadweepa etc.)

Shadaanana - Shtheevana (Shadaanana, Shadgarbha, Shashthi, Shodasha, Shodashi etc.)

 

 

Complete English version of the birth of Shikhandee in Mahaabhaarata

Short story of Amba/Shikhandee

Page one  two   three

First published : 30 January, 2008 AD( Maagha krishna ashtamee, Vikramee samvat 2064)

 

The question arises who is Shikhandee/Shikhandi whom Bheeshma did not shoot.  Shikhandee is tnhe excellence of one's personality. Shikhandee means to destroy viewing only one side of the whole or to develop viewing the whole. A person and this universe both are a combination of two - animate and inanimate, called Purusha and Prakriti. Purusha is one, animate but not visible. On the other hand, Prakriti is multifold, inanimate but visible. When a person's view is centered on Prakriti nourishing it  all the time and he forgets the other, an egotism of doer takes place. This harmful situation can be changed only by centering the view on both Purusha and Prakriti. The first view can be called ignorance which can be destroyed by the other view called knowledge. Bheeshma symbolizes the first one while Shikhandee symbolizes the other.

    There is a detailed description of attaining the above merit named Shikhandee. This merit is obtained only by the virtuous nature residing in every person. Virtuous nature means aiming the high goal of knowing oneself and undergoing penances for this purpose. In the story, Ambaa is the symbol of virtuous nature. She performs here penance on three levels . First, she destroys the impurities on mind and intellectual level. Second, she enables someone to hear thje inner voice which grants a boon of attaining the goal. Third, she transforms herself into Shikhandee - emaciating the multifold view( Prakriti) and ripening oneness view(Purusha)

    The story says that Shikhandee obtained manhood . This symbolizes only the emaciation of Prakriti and maturing Purusha.

                                                                                                                                                                                          

First published : 30 January, 2008 AD( Maagha krishna ashtamee, Vikramee samvat 2064)

 

शिखण्डी

- राधा गुप्ता

टिप्पणी : शिखण्डी शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - शि/क्षि तथा खण्ड । क्षि/शि का अर्थ है - कृश/कमजोर करना( क्षि धातु को वैदिक साहित्य में निवास/क्षय तथा गति के अर्थों में लिया जाता है । श्री युधिष्ठिर मीमांसक ने काशकृत्स्न धातु कोश में स्पष्ट किया है कि आद्युदात्त स्थिति में क्षय का अर्थ निवास, गति आदि है तथा अन्तोदात्त स्थिति में क्षीण होना ।) तथा खण्ड का अर्थ है - टुकडे या विभाजित । अतः शिखण्ड का अर्थ हुआ - खण्ड या विभाजित को कृश करना । मनुष्य की दृष्टि खण्ड भी हो सकती है और अखण्ड भी । खण्ड दृष्टि का अर्थ है - स्वयं को तथा जगत को उसकी समग्रता में न देखना तथा इसके विपरीत अखण्ड दृष्टि का अर्थ है - स्वयं को तथा जगत को उसकी समग्रता में देखना । जिस शरीर तथा जगत को हम हर समय देख रहे हैं, वह वास्तव में पुरुष और प्रकृति का समन्वित रूप है । पुरुष चेतन तथा एक है परन्तु वह दिखाई नहीं देता है । प्रकृति जड तथा नाना रूप वाली है परन्तु वह दिखाई देती है । दिखाई न देने से अज्ञानवश पुरुष तत्त्व विस्मृत हो जाता है तथा जो प्रकृति दिखाई देती है, उसे ही हम सब कुछ मान लेते हैं । हम यह भूल जाते हैं कि प्रकृति तो जड है, पुरुष का चैतन्य ग्रहण करके ही वह चैतन्य सी हो रही है । अतः इस विस्मृति तथा भ्रमपूर्ण कल्पना के कारण ही हम अपने चैतन्य स्वरूप को भूलकर स्वयं को प्रकृति अर्थात् शरीर मात्र मानने लगते हैं । शरीर मात्र मान लेने से ही हमारे भीतर कर्त्तापन का अहंकार उदित होता है । स्वयं को शरीर मात्र तथा जगत को नानात्व मात्र मान लेना ही खण्ड दृष्टि है । इस खण्ड दृष्टि को कृश करके अखण्ड का निर्माण करना शिखण्ड होना है । खण्ड दृष्टि मनुष्य को जन्म से ही प्राप्त हो जाती है परन्तु शिखण्ड का निर्माण करना पडता है ।

शिखण्ड का निर्माण कैसे किया जाए -

          महाभारत ग्रन्थ में ही उद्योग पर्व के अन्तर्गत अम्बा उपाख्यान( अध्याय १७३ से १९२ तक ) के माध्यम से शिखण्ड बनने की विधि को निर्देशित किया गया है । कथा में कहा गया है कि काशिराज की तीन कन्याओं - अम्बा, अम्बिका तथा अम्बालिका का हरण करके जब भीष्म पितामह उन्हें हस्तिनापुर में ले आए , तब अम्बिका तथा अम्बालिका ने तो सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य को पति रूप में स्वीकार कर लिया परन्तु अम्बा ने विचित्रवीर्य की पत्नी बनना अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह पहले ही मन ही मन में शाल्वराज को अपना पति स्वीकार कर चुकी थी । भीष्म ने अम्बा को उसकी इच्छा का आदर करते हुए शाल्वराज के पास भेज दिया परन्तु शाल्वराज ने भीष्म द्वारा हरण की हुई अम्बा को स्वीकार नहीं किया । दु:खी अम्बा तप करने का निश्चय करके तापसों, ऋषियों के आश्रमों में चली गई और ऋषियों द्वारा पूछने पर उन्हें अपनी समस्या बताई । वहीं उसकी भेंट राजर्षि होत्रवाहन से हुई । परस्पर विचार विमर्श के पश्चात् यह निश्चय हुआ कि अम्बा के दुःख का प्रधान हेतु भीष्म ही हैं क्योंकि न तो भीष्म अम्बा का हरण करते, न यह समस्या आती । अतः ऋषियों ने भीष्म के वध का ही निश्चय करके अम्बा को आश्वासन दिया कि परम पराक्रमी परशुराम हमारे मित्र हैं । वे भीष्म के साथ युद्ध करके अवश्य ही भीष्म का वध कर देंगे । तदनुसार तीन दिनों तक भीष्म के साथ परशुराम का युद्ध चलता रहा, परन्तु भीष्म का वध करने में परशुराम समर्थ नहीं हो सके । देवताओं तथा पितरों ने आकर दोनों को समझाया । फलस्वरूप दोनों युद्ध से निवृत्त हो गए । अम्बा अनेकानेक तीर्थों में विचरण करती रही और तप में ही प्रवृत्त रही । अगले जन्म में वह वत्स देश में आधे शरीर से नदी तथा आधे शरीर से कन्या हुई । चूंकि अम्बा पतिधर्म और पतिलोक से वञ्चित हो गई थी, इसलिए इस दूसरे जन्म में भी वह भीष्म वध हेतु पुनः कठोर तप में ही प्रवृत्त हो गई । महादेव जी ने साक्षात् प्रकट होकर अम्बा को वर दिया कि अगले जन्म में वह भीष्म का वध अवश्य करेगी । भीष्म का वध करने के लिए अम्बा पुरुषत्व प्राप्त करना चाहती थी, इसलिए महादेव जी ने अम्बा को आवश्यकतानुसार पुरुषत्व प्राप्त करने का भी वर दिया । तीसरे जन्म में अम्बा राजा द्रुपद के घर शिखण्डी बनकर उत्पन्न हुई । जन्म के समय वह कन्या थी, परन्तु बाद में दशार्णराज हिरण्यवर्मा के कोप से पिता की रक्षा करने के लिए उसने यक्ष प्रदेश में जाकर कठोर तप किया तथा कुबेर के सेवक स्थूणाकर्ण नामक यक्ष से पुरुषत्व प्राप्त किया ।

          उपर्युक्त कथा में वर्णित अम्बा सात्त्विक प्रकृति की प्रतीक है । प्रत्येक मनुष्य में रहने वाली यह सात्त्विक प्रकृति ही तप करते - करते एक दिन शिखण्डी बन जाती है अर्थात् अखण्ड अथवा एकत्व अथवा समग्र दृष्टि का मनुष्य में जो आविर्भाव होता है, उसका कारण मनुष्य में ही निवास करने वाली उसकी की सात्त्विक प्रकृति होती है । इस सात्विक प्रकृति/अम्बा की दो स्वभावगत विशेषताएं होती हैं -

१- सात्विक प्रकृति का एकमात्र लक्ष्य उज्ज्वल प्रखर व्यक्तित्व को प्राप्त करना होता है । शास्त्रों की भाषा में उज्ज्वल प्रखर व्यक्तित्व को स्व - स्वरूप के प्रति जाग्रति भी कहा जा सकता है । पौराणिक साहित्य में पति शब्द लक्ष्य का प्रतीक है तथा शाल्वराज का अर्थ है - शाल्व/चमक + राज अर्थात् उज्ज्वल प्रखर व्यक्तित्व । इसीलिए कथा में कहा गया है कि अम्बा शाल्वराज को मन ही मन अपना पति स्वीकार कर चुकी थी ।

२- सात्त्विक प्रकृति अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिए तप अर्थात् साधना का ही आश्रय लेती है और तदनुरूप ऋषि रूपी उच्चतर चेतनाओं से ही सम्पर्क स्थापित करती है । इसीलिए कथा में कहा गया है कि अम्बा तप करने का ही निश्चय करके तापसों, ऋषियों के आश्रम में चली गई ।

          अम्बा का तीन जन्मों में किया गया तप सात्त्विक प्रकृति की तीन स्तरों पर की गई साधना का प्रतीक है -

१ - मनुष्य की सात्त्विक प्रकृति अपनी पहली साधना इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि के स्तर पर सम्पन्न करती है । इस स्तर पर मनुष्य की सात्त्विक प्रकृति अपने अवगुणों, पापों अथवा दोषों को पहचानकर उनका नाश कर सकती है क्योंकि अवगुणों, पापों अथवा दोषों को काटने वाली परशुराम रूपी विशिष्ट चेतना - सामर्थ्य यहां विद्यमान रहती है । परन्तु इस स्तर की यह मनोबौद्धिक चेतना - सामर्थ्य तथा सात्त्विक प्रकृति अहंकार की भयावहता से सर्वथा अभिज्ञ होती है, इसीलिए अहंकार का नाश करने में सर्वथा विफल रहती है । दूसरे शब्दों में ऐसा भी कह सकते हैं कि मनुष्य के भीतर जो कर्तृत्व अहंकार विद्यमान रहता है, उसका नाश करने में प्रथम स्तर की मनोबौद्धिक चेतना समर्थ नहीं है । इस तथ्य को कथा में अम्बा के राजर्षि होत्रवाहन से मिलन, होत्रवाहन द्वारा भीष्म वध के प्रति अम्बा को आश्वासन , परशुराम तथा भीष्म के भयानक संग्राम तथा परशुराम की पराजय द्वारा व्यक्त किया गया है । होत्रवाहन शब्द होत्र तथा वाहन नामक दो शब्दों से मिलकर बना है । होत्र का अर्थ है - चारों ओर से हुत किए हुए विषय तथा वाहन का अर्थ है - ले जाने वाला । सबसे पहले हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां (कान, त्वचा, जिह्वा, आंख तथा नासिका ) चारों ओर से अपने - अपने विषयों को ग्रहण करके मन तक पहुंचाती हैं, मन बुद्धि तक पहुंचाता है , बुद्धि निर्णय करके पुनः मन को तथा मन इन्द्रियों तक पहुंचाता है । अतः विषयों के वाहक होने के कारण इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि को होत्रवाहन कहना युक्तिसंगत ही है । परशुराम शब्द भी परशु तथा राम नामक दो शब्दों से मिलकर बना है । परशु का अर्थ है - काटने वाली तथा राम का अर्थ है - रमण करने वाली चेतना । अतः परशुराम शब्द दोषों, अवगुणों का कर्तन करने वाली चेतना को इंगित करता है ।

२ - सात्त्विक प्रकृति अपनी साधना का अगला चरण मन - बुद्धि से ऊपर प्रज्ञा के स्तर पर सम्पन्न करती है । इसे प्रकारान्तर से विज्ञानमय कोश भी कह सकते हैं । इसी स्तर पर पहुंचकर सात्त्विक प्रकृति युक्त मनुष्य को अन्तर्वाणी जिसे आत्मा की आवाज भी कहा जाता है, सुनाई देने लगती है, जो उसे अहंकार के नाश की अवश्यम्भाविता के प्रति आश्वस्त करती है । तात्पर्य यह है कि प्रज्ञा अथवा विज्ञानमय कोश के स्तर पर पहुंचकर ही मनुष्य की सात्त्विक प्रकृति अहंकार का नाश करने की सामर्थ्य प्राप्त करती है । कहानी में इस तथ्य को अम्बा द्वारा महादेव के दर्शन तथा महादेव द्वारा अम्बा को वर प्रदान कहकर संकेतित किया गया है । विज्ञानमय कोश को ही कहानी में वत्स देश कहकर इंगित किया गया है । अम्बा रूपी सात्त्विक प्रकृति की वत्स देश में उत्पत्ति को कथासरित्सागर नामक ग्रन्थ के प्रमुख पात्र वत्स देश के राजा उदयन के आधार पर भी समझा जा सकता है । उदयन को एक घोषवती वीणा प्राप्त होती है जिसकी सहायता से वह हाथियों को वश में करने का प्रयत्न करता है । वैदिक संदर्भों के आधार पर यहां घोषवती वीणा को वाक् अर्थात् अन्तर्वाणी तथा हाथी को अहंकार का प्रतीक कहा जा सकता है । वत्सराज उदयन का यह वर्णन उपर्युक्त कथन की ही पुष्टि कर रहा है ।

३ - सात्त्विक प्रकृति अपनी साधना के तीसरे चरण में शिखण्डी बन जाती है । अर्थात् खण्ड दृष्टि ( मात्र शरीर दृष्टि ) शिथिल होने लगती है और अखण्ड दृष्टि की परिपक्वता बढने लगती है । व्यष्टि स्तर पर 'मैं' सत् चित् आनन्दमय चैतन्य रूप हूं तथा यह शरीर उस चैतन्य को अभिव्यक्त करने वाला एक उपकरण है तथा समष्टि स्तर पर 'यह नानारूपात्मक जगत सत् चित् आनन्दमय चैतन्य का ही प्राकट्य है ' - इस प्रकार का दृढ अनुभूत ज्ञान ही मनुष्य की दृष्टि को समग्र अथवा अखण्ड बनाकर कर्तृत्व अहंकार का नाश करने में समर्थ होता है । यह शिखण्डी अर्थात् शिखण्ड दृष्टि राजा द्रुपद के घर में जन्म लेती है । द्रुपद का अर्थ है - द्रु + पद अर्थात् दो प्रकार की गति वाला । हमारा मन ही द्रुपद है क्योंकि वह निम्नतम स्तर की गति वाला भी है और उच्चतम स्तर की गति वाला भी । इसीलिए शास्त्रों में मन को भोग तथा मोक्ष दोनों की प्राप्ति कराने वाला कहा गया है । शिखण्डी दृष्टि उच्चतम स्तर वाले मन में प्रादुर्भूत होकर कर्तृत्व अहंकार के विनाश में सहायक हो जाती है । चूंकि सात्त्विक प्रकृति ही धीरे - धीरे विकास की सीढियां चढते हुए शिखण्डी स्थिति में प्रकट होती है, संभवतः इसीलिए शिखण्डी को स्त्री कहा गया है ।

          शिखण्डी कुबेर के सेवक स्थूणाकर्ण यक्ष द्वारा सेवित वन में तप करती है और पुरुषत्व प्राप्त करती है । कुबेर धन के स्वामी कहे जाते हैं और स्थूणा का अर्थ भी धन है । धन का अर्थ है - व्यवस्था में वृद्धि होना और अव्यवस्था में ह्रास होना । विज्ञान की भाषा में इसे ही एण्ट्रापी का घटना कहा गया है । अतः 'प्रकृति' के नानात्व पर केन्द्रित दृष्टि का 'पुरुष' के एकत्व पर चले जाना यक्ष द्वारा सेवित वन का सेवन करना है । प्रकृति की नानात्व दृष्टि का पुरुष के एकत्व पर आ जाना ही संभवतः शिखण्डी द्वारा पुरुषत्व की प्राप्ति है । अथवा खण्ड दृष्टि कृश होकर जब अखण्डता में रूपान्तरित होती है, तब व्यष्टि रूप शरीर को और समष्टि रूप जगत को प्रकृति और पुरुष के सम्मिलन से बने हुए समग्र रूप में देखती है - सम्भवतः इसीलिए शिखण्डी स्त्री भी है और पुरुष भी ।    महाभारत की कथा में शिखण्डी के दो पुत्र कहे गए हैं । एक क्षत्रदेव तथा दूसरा ऋक्षदेव । पौराणिक साहित्य में पुत्र को गुण के प्रतीक रूप में ग्रहण किया जाता है । क्षत्रदेव का अर्थ है - दिव्य प्रभुता अथवा सामर्थ्य तथा ऋक्षदेव में ऋक्ष का अर्थ है - नक्षत्र, क्षत्रत्व से रहित, जहां क्षत्रियत्व की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है । ऐसा प्रतीत होता है कि शिखण्ड स्थिति में पहुंचने पर मनुष्य में दिव्य सामर्थ्य तथा स्व प्रकाश जैसे गुण आविर्भूत हो जाते हैं ।

          शिखण्डी को तुम्बुरु द्वारा दिए गए दिव्य अश्व वहन करते थे । इसका तात्पर्य भविष्य में अन्वेषणीय है ।

शिखण्डी के संदर्भ में भीष्म का चरित्र

          कौरव मनुष्य मन के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर प्रभृति असद् व्यापारों तथा पाण्डव धर्मनिष्ठा, बल, संकल्प, एकाग्रता, विवेक प्रभृति सद् व्यापारों के प्रतीक हैं । जब तक मन रूपी सिंहासन पर असद् व्यापार अधिष्ठित हैं, तब तक सद् व्यापार राज्य से निष्कासित ही रहते हैं । मन के सिंहासन पर सद् व्यापारों को अधिष्ठित करने के लिए यह आवश्यक है कि असद् व्यापारों का वध कर दिया जाए तथा असद् व्यापारों का वध करने के लिए यह आवश्यक है कि भीष्म पितामह रूपी कर्तृत्व अहंकार का ही वध किया जाए क्योंकि कर्तृत्व अहंकार रूपी भीष्म पितामह ही प्रकृति की त्रिगुणात्मकता( अम्बा, अम्बिका व अम्बालिका ) का आहरण करने के कारण रजस तमस का विस्तार  होने में कारणभूत हैं तथा कर्तृत्व अहंकार के संरक्षण में रहकर ही रजस तमस मन तथा उसके असद् व्यापार फलते - फूलते तथा सुरक्षित रहते हैं । इसीलिए एक स्थान पर भीष्म पाण्डवों से कहते हैं -

          ''मेरे जीते जी युद्ध में किसी प्रकार तुम्हारी विजय नहीं हो सकती । यदि विजय चाहते हो तो मुझ पर शीघ्र ही प्रहार करो । मैं तुम्हारे लिए यह पुण्य की बात मानता हूं कि तुम्हें मेरे इस प्रभाव का ज्ञान हो गया कि मेरे मारे जाने पर सारी कौरव सेना मरी हुई ही हो जाएगी ।'' (भीष्म पर्व १०७.७१)

          परन्तु मनुष्य के लिए अपने कर्तृत्व अहंकार का वध करना सरल नहीं है । कर्तृत्व अहंकार से मुक्त होने के लिए एक साथ तीन क्रियाओं का होना आवश्यक है -

१- कर्तृत्व अहंकार से मुक्त होने की प्रबल इच्छा - कर्तृत्व अहंकार के प्रतीक भीष्म इस इच्छा को व्यक्त करते हुए युधिष्ठिर से कहते हैं -

          'मैं इस देह से ऊब गया हूं । यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो अर्जुन, पांचालों, सृञ्जयों को आगे करके मेरे वध के लिए प्रयत्न करो ।'

          पुनः वे श्रीकृष्ण से भी कहते हैं -

          'आज युद्धभूमि में बलपूर्वक इस उत्तम रथ से मुझे मार गिराइये ।'

२- शिखण्डी की उपस्थिति अर्थात् शिखण्ड दृष्टि का निर्माण

३- दृढ संकल्प पूर्वक कर्तृत्व अहंकार वध रूप लक्ष्य को साधना अर्थात् अर्जुन द्वारा बाण संधान

          उपर्युक्त तीन उपायों में से किसी एक का भी अभाव कर्तृत्व अहंकार का वध नहीं कर सकता । कथा में कहा गया है कि भीष्म पितामह रथ से गिरना चाहते थे तथा अर्जुन सतत् बाण वर्षा करके भीष्म वध का प्रयत्न कर रहा था, परन्तु शिखण्डी के सामने न होने से कार्य सिद्धि नहीं हो पा रही थी, अर्थात् उपर्युक्त वर्णित तीन क्रियाओं में से प्रथम और अन्तिम के वर्तमान रहते हुए मध्यम क्रिया का सर्वथा लोप होने से भीष्म वध रूप अभीष्ट कार्य सम्पन्न नहीं हो पा रहा था । यह मध्यम क्रिया अर्थात् शिखण्डी की उपस्थिति क्या है, यह ऊपर स्पष्ट किया गया है ।

          जैसा कि सर्वविदित ही है, शिखण्डी पहले स्त्री था, इसलिए भीष्म ने युधिष्ठिर को अपनी मृत्यु का रहस्य बताया था कि मैं स्त्री पर प्रहार न करने के अपने संकल्प के अनुसार शिखण्डी पर बाण नहीं चलाउंगा, तभी अर्जुन निरन्तर बाणों का प्रहार करके मुझे मार गिराए ।

The real meaning of Shikhandee/Shikhandi has yet remained elusive. Dr. Radha Gupta has rightly proposed that Shikhandee is one who starts looking at the whole universe as a single identity, not divided into parts. It seems that this capacity is generated when one comes down from abstract trance. Vedic literature states that the mortal body may remain mortal even after sacred initiation. This is not desirable. What should be done to mitigate this defect?  There are indications that Shikhandee can be of use in this situation. One sacred text indicates that the first stage is to destroy sins. Then one has to proceed to devotion which includes awakening of sleeping life forces, the act which is called name. Then the next stage comes of realization of form. The situation of name and form falls under the category when the whole universe is a single identity. The earlier stage of penances is the stage where the universe is a divided entity. In context with the story of Bheeshma and Shikhandee, the second one falls under name and form. And out of these two, one seems to be of masculine character and the other one of feminine character.

 

शिखण्डी का वैदिक स्वरूप

 - विपिन कुमार

वैदिक साहित्य के शिखण्डी को श्रीमती राधा द्वारा महाभारत के शिखण्डी पर डाले गए प्रकाश के संदर्भ में ही समझा जा सकता है । राधा ने शिखण्डी की व्याख्या इस प्रकार करने का प्रयास किया है कि जो खण्डित व्यक्तित्व को अखण्डित बनाने का प्रयास करे, वह शिखण्डी है । शिखण्डी शब्द की निरुक्ति के संदर्भ में, पाणिनीय उणादि कोश की दुर्गसिंह वृत्ति १.३८ में 'शास्तीति शिखण्ड:' निरुक्ति की गई है जिससे संकेत मिलता है कि शिखण्ड शासन करता है, निर्देश देता है, व्यवस्थित करता है । जैसा कि श्रीमती राधा द्वारा कहा गया है, शिखण्डी शब्द में शि अक्षर का पूर्व रूप क्षि धातु हो सकती है जिसके तीन अर्थ हो सकते हैं । वैदिक साहित्य में क्षि धातु का प्रयोग क्षय शब्द की रचना के लिए होता है जिसका अर्थ निवास तथा गति है । लौकिक भाषा में क्षि धातु का प्रयोग क्षय, क्षीण होने के अर्थ में होता है । श्री युधिष्ठिर मीमांसक ने काशकृत्स्न धातु कोश में अपनी टिप्पणी में कहा है कि यदि क्षय शब्द में क्ष उदात्त है तो उसका अर्थ निवास से होगा । यह वैदिक रूप है । यदि क्षय शब्द में य उदात्त है तो इसका अर्थ क्षीण होना होगा । यह लौकिक रूप है । शांखायन ब्राह्मण ७.४ से संकेत मिलता है कि शिखण्डी शब्द दोनों रूपों का प्रतिनिधित्व करता है । कहा गया है कि जो मर्त्य शरीर एक बार दीक्षित हो चुका है, उसका क्षय नहीं होना चाहिए । अतः उसके क्षय को रोकने की क्या विधि हो सकती है ? इससे आगे इस संदर्भ में वृष्णिवृद्ध - पुत्र आसोल, कवि - पुत्र इटन् तथा यज्ञसेन - पुत्र शिखण्डी के नाम आए हैं । संदर्भ पूर्णतः स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना तो अनुमान लगाया जा सकता है कि संदर्भ दीक्षित मर्त्य शरीर को अमर्त्य बनाने का है ।

          ऋग्वेद ९.१०४ व ९.१०५ सूक्तों( सखाय आ निषीदत इति ) के ऋषि नारद - पर्वतौ या शिखण्डिन्यौ अप्सरसौ हैं । यह सूक्त सामवेद में भी प्रकट हुए हैं । इन सूक्तों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि शिखण्डिनी अप्सरा - द्वय की प्रकृति भी नारद - पर्वत जैसी होनी चाहिए । डा. फतहसिंह का कथन है कि नारद दिव्य आपः, दिव्य प्राणों के देने वाले हैं जबकि पर्वत को तीर्थयात्रा करने की, तप करने की आवश्यकता पडती है ( द्र. नारद पर टिप्पणी ) । नारद की भगवद् - भक्ति प्रसिद्ध है । अतः इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि शिखण्डी या शिखण्डिनी में भी भक्ति का समावेश होना चाहिए । जिस प्रकार पर्वत ऋषि पौराणिक कथाओं में तीर्थ यात्रा करता है, उसी प्रकार महाभारत की अम्बा भी तीर्थ यात्रा करती है । शिखण्डी और भक्ति का रहस्य ताण्ड्य ब्राह्मण १४.५.४ के इस कथन से खुलता है कि ऋग्वेद के 'सखाय आ निषीदत इत्यादि' सूक्त का विनियोग वालखिल्यों के लिए है । द्वादशाह नामक सोमयाग में प्रथम ६ दिन एकान्तिक साधना के होते हैं जिसमें छठे दिन वृत्र का वध होता है । इससे आगे सातवां दिन नाम का तथा आठवां दिन रूप का होता है । यह कहा जा सकता है कि छठे से सातवें दिन एकान्तिक साधना से सार्वत्रिक साधना में संक्रमण होता है । ताण्ड्य ब्राह्मण १२.५.५ का कथन है कि इस ऋचा सखायः आ निषीदत में जो निषीदत, बैठ जाओ, प्रतिष्ठित हो जाओ कहा जा रहा है, वह उन प्राणों के लिए कहा जा रहा है जो उद्धत जैसे हैं । डा. फतहसिंह का कथन है कि वालखिल्य प्राण वह होते हैं जो बिखरे हुए प्राण होते हैं । इन प्राणों की प्रतिष्ठा करनी है, इन्हें नाम और रूप बनाना है । यही भक्ति है । पुराणों की एक कथा में शिखण्डी राजा की कन्या अपने पूर्व जन्म का स्मरण करती है कि हनूमन्तेश्वर तीर्थ में अस्थि क्षेप से उसको मुक्ति मिली । हनुमान स्वयं भक्ति की पराकाष्ठा है । अतः यह संभव है कि महाभारत में जब शिखण्डी भीष्म का वध कर रहा है, उससे तात्पर्य एकान्तिक साधना से सार्वत्रिक साधना में संक्रमण है ।

          वैदिक साहित्य में शिखण्डी शब्द प्रायः रुद्र के एक नाम के रूप में प्रकट हो रहा है -

विज्यं धनुश् शिखण्डिनो विशल्यो बाणवां उत । अनेशन्न् अस्येषवश~ शिवो अस्य निषङ्गथि: ।।

 - पैप्पलाद संहिता १४.२.१५ , नीलरुद्रोपनिषद २.१२

दूसरा मन्त्र है -

अपश्यं त्वावरोहन्तं दिवतः पृथिवीम् इव । अपश्यम् अस्यन्तं रुद्रं नीलग्रीवं शिखण्डिनम् ।।

- पैप्पलाद संहिता १४.२.१, नीलरुद्रोपनिषद १.१

इन मन्त्रों से संकेत मिलता है कि शिखण्डी अवस्था समाधि से व्युत्थान की अवस्था हो सकती है । प्रथम मन्त्र में शिखण्डी के धनुष के ज्या - रहित होने की कामना की गई है । ज्या गुण को कहते हैं । इसका निहितार्थ यह हुआ कि शिखण्डी रुद्र के धनुष के निर्गुण होने की कामना की गई है । यह निर्गुण समाधि का, निर्विकल्प समाधि का प्रतीक हो सकता है । दूसरे मन्त्र में शिखण्डी रुद्र का विशेषण नीलग्रीव दिया गया है । एक कथा में आता है कि शिव ने समुद्र मन्थन से उत्पन्न विष का पान किया और उस विष को कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया, इसलिए वह नीलग्रीव कहलाए । पुराणों में जालन्धर के संदर्भ में एक कथा आती है कि इन्द्र बृहस्पति को साथ लेकर शिव की खोज करने गया । उसे शिव/कल्याणकारी के दर्शन तो नहीं हुए, कोई भयंकर पुरुष दिखाई दिया जिसने इन्द्र का स्वागत नहीं किया । इन्द्र ने उस पर वज्र से प्रहार किया जिससे उसका गला नीला हो गया । वही नीलग्रीव रुद्र हैं । डा. फतहसिंह का कथन है कि साधना के आरम्भ में तो भयंकर शिव के ही दर्शन होते हैं, कल्याणकारी शिव के नहीं । संसार में दुर्गुणों/विष का पान कर जाना और इन्द्र का वज्र मारना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ।

           

शिखण्डी के अन्य वैदिक संदर्भ -

ॐधनुर् बिभर्षि हरितं हिरण्ययं सहस्रक्षि शतवधं शिखण्डिन् । - पैप्पलाद संहिता १६.१०५.२

ॐयत्राश्वत्था न्यग्रोधा महावृक्षाश~ शिखण्डिनः । तत् परेताप्सरस: प्रतिबुद्धा अभूतन ।। - पैप्पलाद संहिता १३.४.७

ॐविश्वजन्या: पञ्चजन्या महारुक्माश~ शिखण्डिनी: । सर्वा इन्द्रस्य वज्रेणाहता बुद्-बुदया तव ।। - पैप्पलाद संहिता १५.१८.२

ॐमित्रावरुणौ श्रोणीभ्यामिन्द्राग्नी शिखण्डाभ्याम् इन्द्राबृहस्पती ऊरुभ्याम् - - - - तैत्तिरीय संहिता ५.७.१५.१

ॐभसदे स्वाहा शिखण्डेभ्य: स्वाहा बालधानाय स्वाहा - तैत्तिरीय संहिता ७.३.१६.२

ॐप्रायश्चित्तम् : तद् यऽएतेऽभितः पुच्छकाण्डं शिखण्डास्थे ऽअनुच्छयाते - तयोर्यद्दक्षिणं तस्मिन्नेताश्चतुस्त्रिंशतमाज्याहुतीर्जुहोति । एतावान्वै सर्वो यज्ञो - यावत्य एताश्चतुस्त्रिंशद् व्याहृतयः भवन्ति - शतपथ ब्राह्मण ४.५.७.५

ॐशैखण्डिनं सामम् ( ऊह रहस्य गानम्, सम्पादक: - श्रीमायूर रामनाथ शर्मा ) -

प्र त आश्विनी: पवमान धेनवो दिव्या असृग्रन्पयसा धरीमणि ।

प्रान्तरिक्षात्स्थाविरीस्ते असृक्षत ये त्वा मृजन्त्यृषिषाण वेधस: ।।

उभयतः पवमानस्य रश्मयो ध्रुवस्य सत: परियन्ति केतव: ।

यदा पवित्रे अधि मृज्यते हरिस्सत्ता नि योनौ कलशेषु सीदति ।।

विश्वा धामानि विश्वचक्ष ऋभ्वस: प्रभोष्टे सत: परियन्ति केतव: ।

व्यानशे पवसे सोम धर्मणा पतिर्विश्वस्य भुवनस्य राजसि ।।