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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(Shamku - Shtheevana)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

 

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Shamku -  Shankushiraa  ( words like Shakata/chariot, Shakuna/omens, Shakuni, Shakuntalaa, Shakti/power, Shakra, Shankara, Shanku, Shankukarna etc. )

Shankha - Shataakshi (Shankha, Shankhachooda, Shachi, Shanda, Shatadhanvaa, Shatarudriya etc.)

Shataananda - Shami (Shataananda, Shataaneeka, Shatru / enemy, Shatrughna, Shani / Saturn, Shantanu, Shabara, Shabari, Shama, Shami etc.)

Shameeka - Shareera ( Shameeka, Shambara, Shambhu, Shayana / sleeping, Shara, Sharada / winter, Sharabha, Shareera / body etc.)

Sharkaraa - Shaaka   (Sharkaraa / sugar, Sharmishthaa, Sharyaati, Shalya, Shava, Shasha, Shaaka etc.)

Shaakataayana - Shaalagraama (Shaakambhari, Shaakalya, Shaandili, Shaandilya, Shaanti / peace, Shaaradaa, Shaardoola, Shaalagraama etc.)

Shaalaa - Shilaa  (Shaalaa, Shaaligraama, Shaalmali, Shaalva, Shikhandi, Shipraa, Shibi, Shilaa / rock etc)sciple, Sheela, Shuka / parrot etc.)

Shilaada - Shiva  ( Shilpa, Shiva etc. )

Shivagana - Shuka (  Shivaraatri, Shivasharmaa, Shivaa, Shishupaala, Shishumaara, Shishya/de

Shukee - Shunahsakha  (  Shukra/venus, Shukla, Shuchi, Shuddhi, Shunah / dog, Shunahshepa etc.)

Shubha - Shrigaala ( Shubha / holy, Shumbha, Shuukara, Shoodra / Shuudra, Shuunya / Shoonya, Shoora, Shoorasena, Shuurpa, Shuurpanakhaa, Shuula, Shrigaala / jackal etc. )

Shrinkhali - Shmashaana ( Shringa / horn, Shringaar, Shringi, Shesha, Shaibyaa, Shaila / mountain, Shona, Shobhaa / beauty, Shaucha, Shmashaana etc. )

Shmashru - Shraanta  (Shyaamalaa, Shyena / hawk, Shraddhaa, Shravana, Shraaddha etc. )

Shraavana - Shrutaayudha  (Shraavana, Shree, Shreedaamaa, Shreedhara, Shreenivaasa, Shreemati, Shrutadeva etc.)

Shrutaartha - Shadaja (Shruti, Shwaana / dog, Shweta / white, Shwetadweepa etc.)

Shadaanana - Shtheevana (Shadaanana, Shadgarbha, Shashthi, Shodasha, Shodashi etc.)

 

 

षट्पदी

सोमयागे प्रयाजकर्मसु वौ३षट् इति उच्चारणं भवति। कथनमस्ति यत् असौ वाव वौ, ऋतवः षट्। असौ आदित्यः। यदा आदित्यः मर्त्यलोके स्वविस्तारं षट्ऋतूनां रूपे करोति, तत् वौषट् भवति। अयं प्रतीयते यत् षट्पदी शब्दः वौषट् शब्दस्य परोक्षरूपं अस्ति। प्रयाजकर्मसु वौषट् शब्दस्य उच्चारणं आकस्मिकरूपेण न भवति। यदा वौषट्शब्दस्य उच्चारणं भवति, तदा मेघाः वर्षन्ति। वर्षणात् पूर्वं वर्षणहेतु यत्किंचित् आवश्यकं भवति, तत् सर्वं प्रस्तूयते पुरोवातः, मेघानां गर्जनं (स्तनयित्नुः), विद्युत् , मेघानां प्लावनं आदि। वर्षणं केवलं मेघानां वर्षणे एव सीमितं नास्ति। यदा गौ स्ववत्सस्य हेतोः दुग्धस्रावणं करोति, तत् अपि वर्षणं भवति। अस्मिन् जगति कस्यापि क्षुद्रायाः घटनायाः परिणति यदि वर्षणे भवति, तदपि वौषट् अस्ति।

 

ये कीर्तयन्ति वरदं वरपद्मनाभं शङ्खाब्जचक्रवरचापगदासिहस्तम्  ।

पद्मालयावदनपङ्कजषट्पदाख्यं नूनं प्रयान्ति सदनं मधुघातिनस्ते  ॥वामन ९४.७३

उपरोक्त श्लोक में पद्मनाभ संज्ञक विष्णु की स्तुति की जा रही है कि पद्मनाभ विष्णु के हाथों में शंख, पद्म. चक्र, चाप, गदा व असि हैं। वह पद्मालया अर्थात् लक्ष्मी के मुखकमल का षट्पद बनकर पान करते हैं। जो इस कथन का कीर्तन करते हैं, वह निश्चय ही मधुघाती विष्णु के लोक को जाते हैं।

इस श्लोक में प्रकृति लक्ष्मी है जिसके मुखकमल का पान पुरुष विष्णु करता है। लोक में सार्वत्रिक रूप से प्रकृति को पुरुष से हीन समझा जाता है। लेकिन उपरोक्त श्लोक के अनुसार पुरुष को भी प्रकृति का आस्वादन करने की आवश्यकता होती है। वह प्रकृति कौन सी है जिसका आस्वादन करने की पुरुष को आवश्यकता पडती है। ओंकार के तीन अवयव तो अ- ब्रह्मा, विष्णु तथा म शिव होते हैं। चौथी अर्धमात्रा को प्रकृति कहा जाता है। यह वही सर्वोच्च स्तर की प्रकृति है जिसके मुखकमल का पान करने की पुरुष को आवश्यकता होती है। विष्णु के संदर्भ में यह लक्ष्मी कहलाती है, कृष्ण के संदर्भ में राधा, शिव के संदर्भ में पार्वती।

            श्लोक में कहा जा रहा है कि पद्मनाभ षट्पद होकर मुखकमल का पान कर रहे हैं। यह छह पद कौन से हैं, यह श्लोक में ही निहित है, ऐसा प्रतीत होता है। विष्णु की भुजाएं ही षट्पद हैं। इन भुजाओं में शंख, पद्म, चक्र, चाप, गदा व असि धारित हैं। इनके माध्यम से विष्णु प्रकृति का आस्वादन कर सकते हैं।

सर्वप्रथम पद्म पर विचार करते हैं कि साधना में पद्म क्या हो सकता है। वैदिक साहित्य में पद्म किस रूप में प्रकट हुआ है, यह स्पष्ट नहीं है। उणादिकोश में पद्म की निरुक्ति पद-म के रूप में की गई है। पौराणिक साहित्य में पद्म जिस रूप में प्रकट हुआ है, उसका श्रेष्ठतम सार श्री रजनीश ने अपने व्याख्यान कुण्डलिनी और सात शरीर  में दे दिया है। पुराणों के कथनों के अनुसार पद्म का एक लक्षण यह है कि उसका पत्र अपने परितः स्थित जल से गीला नहीं होता। पद्म के केसर, कर्णिका व बीज को कारण रूप कहा गया है जिनके प्रतीक रूप में जम्बू द्वीप और मेरु पर्वत के नाम आए हैं। विष्णु की नाभि से जो कमल उत्पन्न हुआ है, उस पर जब तक ब्रह्मा विराजमान न हो जाए, तब तक उसका वर्ण कृष्ण रहता है। ब्रह्मा के विराजमान होने पर ही वह श्वेत बनता है। पद्म की प्रकृति सात्विक कही गई है। पद्मनाभ विष्णु की शक्ति के रूप में श्रद्धा का नाम आया है(नारद १.६६.८९)। इन सभी तथ्यों का समावेश रजनीश द्वारा अपने व्याख्यान में कर दिया गया है। योगवासिष्ठ उत्पत्ति प्रकरण ३.१५.१९ में राजा पद्म और उसकी रानी लीला का विस्तृत प्रसंग है। लीला चाहती है कि उसके पति की मृत्यु कभी न हो। लेकिन वरदाता का कहना है कि यह तो हो नहीं सकता। लेकिन एक उपाय है। यदि लीला अपने संकल्प से पद्म को ओझल न होने दे तो पद्म की मृत्यु होते हुए भी वह उसके लिए अमर बना रहेगा ( रजनीश ने हृदय चक्र में संकल्प की संभावना का कथन किया है। श्रद्धा का कथन नाभिचक्र में किया गया है)। योगवासिष्ठ में लीला के भी दो स्वरूप कहे गए हैं एक लौकिक और दूसरी सरस्वती।

गदा अस्त्र के संदर्भ में, गद व्याधि को कहते हैं। आयुर्वेद में अगदतन्त्र, विष से मुक्ति के तन्त्र का वर्णन आता है। पुराणों में गदा को प्राकार कहा गया है। गदी विष्णु की शक्ति का नाम दुर्गा है। गदा को समझने का सर्वश्रेष्ठ उपाय महाभारत शल्यपर्व  २९.४४ की यह कथा है कि दुर्योधन ह्रद के जल को माया से स्तम्भित करके उसमें विश्राम करने लगा। पता लगने पर पाण्डवों ने उसे गदा युद्ध के लिए ललकारा। गदा युद्ध में वह मारा गया। अपने परितः स्थित जल को स्तम्भित करना ही गदा का गुण है। दुर्योधन ने जल का स्तम्भन माया से किया। हमें जब भूख लगती है तो हम भोजन से भूख का स्तम्भन कर देते हैं। एक स्थिति अरिष्टनेमि की है जिसके विषय में कहा गया है कि तीर्थंकर पुरुष के परितः एक सीमा में हिंसा हो ही नहीं सकती। यह जल के स्तम्भन का दूसरा प्रकार है। इस सीमा का निर्माण करना ही गदा का कार्य है। गया तीर्थ के संदर्भ में कहा गया है कि हृदय के परितः जो हिता नामक नाडियां हैं, उनमें हृदय का प्राण जाकर विश्राम करता है। जैसा नाडियों का स्वरूप होता है, वैसे ही स्वप्न दिखाई देने लगते हैं। गदा का कार्य इन नाडियों का शोधन है। गयासुर के संदर्भ में कहा गया है कि गदा का कार्य यह है कि वह गयासुर के कम्पन को रोक देती है। कम्पन का अर्थ है कि बाहर के सुख-दुःख आत्मा को कम्पित करते हैं जिसके कारण आत्मा अपना वास्तविक कार्य करने में अक्षम हो जाती है। विष्णु की गदा का नाम कौमौदकी, कुमुद के गुण वाली। कुमुद रात्रि में खिलता है, पद्म दिन में।

            गोपथ ब्रा. १.२.९ में अग्नि को षट्पद कहा गया है जिसके पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, आपः, ओषधि-वनस्पति तथा भूत छह पाद हैं। सोमयाग में प्रयाजकर्म में क्रमिक रूप से इन व्याहृतियों का उच्चारण किया जाता है(तैत्तिरीय संहिता १.६.११.१) आश्रावय, अस्तु श्रौषट्, यज, ये यजामहे, वौ३षट्। वौषट् शब्द का उच्चारण करते ही अग्नि में घृत की आहुति दी जाती है।  इस कर्म की व्याख्या इस प्रकार की गई है कि आश्रावय के उच्चारण से पुरोवात की सृष्टि की गई, अस्तु श्रौषट् से मेघों का आप्लावन, - -- ये यजामहे से स्तनयित्नु या गर्जन की और वौषट् से विद्युत की सृष्टि की गई जिससे मेघ वर्षण करने लगते हैं। अन्यत्र कहा गया है कि असौ वाव वौ, ऋतवो षट्, अर्थात् सूर्य वौ है। वौषट् का उच्चारण करने से सूर्य ६ ऋतुओं में प्रवेश कर जाता है। अतः ६ ऋतुओं को सूर्य के ६ पद कहा जा सकता है, यद्यपि सूर्य के संदर्भ में केवल ३ पदों का ही उल्लेख है। वौषट् कृत्य के पश्चात् कभी कभी अनुवषट्कार कृत्य भी होता है जिसमें वषट्कार के अन्त में उच्चारण किया जाता है सोमस्याग्ने वीही वौ३षट्।

            जैमिनीय ब्राह्मण १.७ में  सूर्य का षोढा प्रकार से अस्त कहा गया है। अस्त होता हुआ सूर्य ब्राह्मण में श्रद्धा रूप में, पशुओं में पयः रूप में, अग्नि में तेज रूप में, ओषधि में ऊर्क् रूप में, आपः में रस रूप में तथा वनस्पति में स्वधा रूप में प्रवेश कर जाता है। फिर प्रातःकाल सूर्य का सम्पादन इसी क्रम से करना होता है।

            जैमिनीय ब्राह्मण १.९८ में इस लोक में ६ पापों का उल्लेख है जिनको तरना होता है  - स्वप्नं तन्द्रीं मन्युम् अशनयाम् अक्षकाम्यां स्त्रीकाम्याम् इति। एते ह वै पाप्मानः पुरुषम् अस्मिन् लोके सचन्ते। य एतद् अग्ने तीर्त्वास्मिन् लोके साधु चिकीर्षात् तत् त्वम् अस्मिन् लोके धीप्सताद् इत्य् अग्निम् अस्मिन् लोके ऽदधुः। वायुम् अंतरिक्ष आदित्यं दिवि॥ इनको तरने से इस लोक में अग्नि की प्रतिष्ठा हो जाती है। भागवत पुराण में षड्गर्भों के नाम आए हैं स्मर, उद्गीथ, परिष्वंग, पतङ्ग, क्षुद्रभृद् व घृणि। स्मर (स्मरण) की तुलना स्वप्न से, अशना की परिष्वंग अथवा पतंग से, अक्षकाम्या की क्षुद्रभृद् से की जा सकती है। परिष्वंग के विषय में कहा गया है कि माया अंगों का परिष्वजन करती है।

 

*विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर॥

नैते निर्माल्यतां यान्ति क्रियमाणाः पुनः पुनः।

तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग॥

पञ्च प्रवहणान्ये भवाब्धौ मज्जतां नृणाम्।

विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्र धेनवः॥

असारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी। - गरुड ..२२-२४

*विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर।

नैते निर्माल्यतां यान्ति क्रियमाणाः पुनः पुनः॥

कुशाः पिण्डेषु निर्माल्याः ब्राह्मणाः प्रेतभोजने।

मन्त्राः शूद्रेषु पतिताश्चितायाश्च हुताशनः॥

तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग।

पञ्च प्रवहणान्येव भवाब्धौ मज्जतां सताम्॥

विष्णुरेकादशी गीता तुलसीविप्र धेनवः।

अपारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी॥ गरुड २.२९.२१-२४

*तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग॥

पञ्च प्रवहणान्येव भवाब्धौ मज्जतां नृणाम्।

विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्र धेनवः॥

असारे दुर्गसंसारे षट्पदी भक्तिदायिनी। गरुड २.३२.९९-१००

विष्णुरेकादशी गावः तुलसी विप्र धेनवः

असारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी।। - लक्ष्मीनारायण संहिता १.७३.३६

*त्रिपदा हरिजा पूर्वमुखी ब्रह्मास्त्रसंज्ञिका

चतुर्विंशतितत्त्वाढ्या पातु प्राचीं दिशं मम ।।१४२

चतुष्पदा ब्रह्मदण्डा ब्रह्माणी दक्षिणानना

षड्विंशतत्त्वसंयुक्ता पातु मे दक्षिणां दिशम्।। १४३

प्रत्यङ्मुखी पञ्चपदी पञ्चाशत्तत्त्वरूपिणी

पातु प्रतीचीमनिशं मम ब्रह्मशिरोङ्किता।। १४४

सौम्यास्या ब्रह्मतुर्याढ्या साथर्वाङ्गिरसात्मिका

उदीचीं षट्पदा पातु षष्टितत्त्वकलात्मिका।। १४५

पञ्चाशद्वर्णरचिता नवपादा शताक्षरी

व्योमा संपातु मे वोर्द्ध्वशिरो वेदान्त संस्थिता।।१४६ नारद १.८३.१४६

*एकपाद् द्विपद इति। वायुर् एकपात्। तस्याकाशं पादः। चन्द्रमा द्विपात्। तस्य पूर्वपक्षापरपक्षौ पादौ। आदित्यस् त्रिपात्। तस्येमे लोकाः पादाः। अग्निः षट्पादस्। तस्य पृथिव्य् अन्तरिक्षं द्यौर् आप ओषधिवनस्पतय इमानि भूतानि पादास्। तेषां सर्वेषां वेदा गतिर् आत्मा प्रतिष्ठिताश् चतस्रो ब्रह्मणः शाखाः - गोपथ ब्रा. १.२.९

*द्विपदा या चतुष्पदा त्रिपदा या च षट्पदा।।

अष्टापदी नवपदी सहस्राक्षाक्षरात्मिका

अष्टोत्तरशतं नाम्नां सावित्र्या यः पठेन्नरः।।

स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ।। नारद १.८३.१६५-१६६

तु. 
गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी ।

अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् ॥ - ऋ. १.१६४.४१

 

*एको नानायते योऽसौ नटवज्जायतेऽव्ययः ।।

व्यापकोऽपि कृपालुत्वाद्भक्तहृत्पद्मषट्पद ।।

ददाति विविधानंदं तं वंदे जगतां पतिम् ।। १६ ।। ।। स्कन्द २.३.५.१६

*दिष्ट्या पञ्चसु रक्तोऽसि दिष्ट्या ते षट्पदी जिता |

द्वे पूर्वे मध्यमे द्वे च द्वे चान्ते साम्परायिके |||| - वनपर्व ३१४.९

पञ्चस्वात्मदर्शनसाधनेषु शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वेति श्रुत्युक्तेषु शमादिषु। दिष्ट्या पूर्वपुण्यवशाद्रक्तोसि तस्य फलं च षट्पदीजयः। पद्यन्ते प्राप्नुवन्ति देहिनमिति पदानि षडूर्मयो योशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येतीति श्रुत्युक्तः। तेषां षण्णां पदानां समाहारः षट्‌पदी सा त्वया जिता। तेषु पदेषु द्वे पदे पूर्वे जातमात्रस्य ह्यशनायापिपासे प्रथमं भवतः। द्वे मध्ये शोकमोहौ। शोक इष्टवियोगजश्चित्तस्य संतापः। मोहोऽतिपापेन कार्याकार्यप्रतिसंधानशून्यत्वम्। एते मध्ये मध्यमे वयसि प्राप्नुतः। सांपरायिके जरामृत्यू उत्तरे वयस्युपतिष्ठतः। संपरायः परलोकस्तं प्रति नेतुमुदिते सांपरायिके ।। - टीका

कृत्वा च मध्ये राजानममात्यांश्च यथाविधि |

षट्पथं नवसंस्थानं निवेशं चक्रिरे द्विजाः ॥१०॥ आश्वमेधिक ६४

*तामात्मनः स शिरसः स्रजमुन्मत्त षट्पदाम्  ।

आदायामरराजाय चिक्षेपोन्मत्तवन्मुनिः  ॥विष्णु  १,९.८

*तामात्मशिरसोमालां भ्रमदुन्मत्तषट्पदाम्

आदायामरराजाय चिक्षेपोन्मत्तवन्मुनिः  पद्म १.४.१२

*क्वासौ हनूमान्रामस्य चरणांभोजषट्पदः

यत्प्रसादादहं प्राप्स्ये राजराजस्य दर्शनम्  पद्म ५.२९.३२

*समुद्रः पीतकौशेय वाससी समुपाहरत्

वरुणः स्रजं वैजयन्तीं मधुना मत्तषट्पदाम्  ॥भागवत ०८.०८.०१६

*गृहानहिंसन्नातिष्ठेद्वृत्तिं माधुकरीं मुनिः  ॥ ११.०८.०१०

अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः  ।

सर्वतः सारमादद्यात्पुष्पेभ्य इव षट्पदः  ॥भागवत ११.०८.०१०

*यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति  ।

तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वासंख्येयषट्पदम्  ॥ मार्कण्डेय ९१.४९

*ये कीर्तयन्ति वरदं वरपद्मनाभं शङ्खाब्जचक्रवरचापगदासिहस्तम्  ।

पद्मालयावदनपङ्कजषट्पदाख्यं नूनं प्रयान्ति सदनं मधुघातिनस्ते  ॥वामन ९४.७३

*क्षणमायाति पातालं क्षणं याति नभस्थलम् ।

क्षणं भ्रमति दिक्कुञ्जे तृष्णा हृत्पद्मषट्पदी ॥ ३.२४॥ महोपनिषद ३.२४

*वपुर्वह्निकणाकारं स्फुरितं व्योम्नि पश्यति ॥ १५२॥ 

अहङ्कारकलायुक्तं बुद्धिबीजसमन्वितम् ।

तत्पुर्यष्टकमित्युक्तं भूतहृत्पद्मषट्पदम् ॥ १५३॥ - महोपनिषद ५.१५३

*बहुशास्त्र गुरूपासने ऽपि सारादानं षट्पदवत् । सांख्यसूत्र-४.१३। (सारग्रहणावश्यकता)

 

*अष्टौ कोणाधिपास्तत्र कोणार्धेष्वष्टसु स्थिताः(३)  ॥९३.००५

षट्पदास्तु मरीच्याद्या दिक्षु पूर्वादिषु क्रमात् ।९३.००६ अग्नि

तदधःकोष्ठके दद्यात्सावित्र्यै च कुशोदकं(९)  ।९३.०२०

दक्षिणे चन्दनं(१०) रक्तं षट्पदाय विवस्वते  ॥९३.०२०

वरुण्यां षट्पदासीने मित्रे सगुडमोदनं  ।९३.०२२

ददीत माषनैवेद्यं(१) षट्पदस्थे धराधरे(२)  ॥९३.०२३

गृहे च नगरादौ च एकाशीतिपदैर्यजेत् ।९३.०३१

त्रिपदा रज्जवः कार्याः षट्पदाश्च विकोणके  ॥९३.०३१

ईशाद्याः पादिकास्तस्मिन्नागद्याश्च द्विकोष्ठगाः(१)  ।९३.०३२

षट्पदस्था मरीच्याद्या ब्रह्मा नवपदः स्मृतः  ॥९३.०३२

नगरग्रामखेटादौ वास्तुः शतपदोऽपि(२) वा  ।९३.०३३

वंशद्वयं कोणगतं दुर्जयं दुर्धरं सदा  ॥९३.०३३

यथा देवालये न्यसस्तथा शतपदे हितः  ।९३.०३४

ग्रहाः स्कन्दादयस्तत्र विज्ञेयाश्चैव षट्पदाः  ॥९३.०३४

तदधश्चापवत्साख्यं केन्द्रन्तरेषु षट्पदे  ॥१०५.००९

मरीचिकाग्निमध्ये तु सविता द्विपदस्थितः  ।१०५.०१०

सावित्री तदधो द्व्यंशे विवस्वान् षट्पदे त्वधः  ॥१०५.०१०

पितृब्रह्मान्तरे विष्णुमिन्दुमिन्द्रं त्वधो जयं  ।१०५.०११

वरुणब्रह्मणोर्मध्ये मित्राख्यं षट्पदे यजेत् ॥ अग्नि १०५.०११

कोषस्य च परिज्ञानं जनानां जनवल्लभ

रसवद्द्रव्यमाकर्षेः पुष्पेभ्य इव षट्पदः ६ नारद २.१९.६

अयं मम करे शङ्खः पाञ्चजन्यः स्फुरद्ध्वनिः ।

मूर्तं खमिव शब्दात्मा क्षीरोद इव संस्थितः ।। ५१

अयं मे कर्णिकाकोशनिलीनब्रह्मषट्पदः ।

पद्मः करतले श्रीमान्स्वनाडीकुहरोद्भवः ।। ५२

इयं मे रत्नचित्राङ्गी सुमेरुशिखरोपमा ।

हेमाङ्गदा गदा गुर्वी दैत्यदानवमर्दिनी ।। ५३

अयं मे भास्कराकार उद्यदंशुः सुदर्शनः ।

ज्वालाजटिलपर्यन्तपरिपाटलदिक्तटः ।। ५४

अयं मे केतुमद्वह्निसुन्दरो ज्वलितोऽसितः ।

कुठारो दैत्यवृक्षाणां नन्दयन्नन्दकः स्थितः ।। ५५

इदं मे शरधाराणां पुष्करावर्तकोपमम् ।

शार्ङ्गं धनुरहीन्द्राभमिन्द्रकार्मुकसुन्दरम् ।। ५६ - योगवासिष्ठ ५.३१.५२

अहं त्रिनेत्रयाऽऽकृत्या गौरीवक्त्राब्जषट्पदः । योगवासिष्ठ ५.३४.४५

भोगिभोगासने तस्थौ श्वेतास्त इव षट्पदः ।।५.४२.३

 

 

षडाम्नायाः, , ( षट् आम्नायाः ।)

शिवस्य षड्वक्त्रविनिर्गतषट्प्रकारतन्त्रशास्त्रम् । यथा,- श्रीशिव उवाच ।

'अथेदानीं प्रवक्ष्यामि आम्नायकथनं पृथक् ।

पूर्व्वाम्नायो यदा मन्त्रस्तदा प्राचीदिशि स्थितः।

सदाशिवोऽहं भगवानाचारः परिकीर्त्तितः ।

एवं वै दक्षिणाम्नायो दक्षिणस्यां दिशि स्थितः।।

एवं हि पश्चिमाम्नायः पश्चिमायां दिशि स्थितः।

एवमेवोत्तराम्नाय उत्तरस्यां दिशि स्थितः ।।

मुखमूर्द्ध्वकृतं देवि! यत् प्रोक्तं तव सन्निधौ ।

ऊर्द्ध्वाम्नायश्च कथितो देवानामपि दुर्ल्लभः ।।

यदा चाधोमुखं देवि यत् प्रोक्तं गिरिजे प्रिये ।

अध आम्नाय इत्युक्तः सत्यं सत्यं सुमध्यमे ।

षडाम्नायाश्च कथिताश्चोत्पत्तिक्रमनामतः ।।

यस्मिन् यस्मिंश्च ये देवाः कथिताश्च वरानने ।

तान्देवांश्च प्रवक्ष्यामि साधकानां हिताय वै।।

श्रीविद्याभेदसहिता तारा च त्रिपुरा तथा ।

भुवनेशी चान्नपूर्णा पूर्व्वाम्नाये प्रकीर्त्तिताः ।।

वगलामुखी च वशिनी त्वरिता धनदा तथा । (वशिनी बालभैरवीत्यर्थः) ।

महिषघ्नी महालक्ष्मीर्द्दक्षिणाम्नायकीर्त्तिताः ।।

महास्वरस्वती विद्या तथा वाग्वादिनी परा ।

प्रत्यङ्गिरा भवानी च पश्चिमाम्नायकीर्त्तिताः ।।

कालिका भेदसहिता ताराभेदैश्च संयुता ।

मातङ्गी भैरवी च्छिन्ना तथा धूमावती परा ।

उत्तराम्नायकथिताः कलौ शीघ्रफलप्रदाः ।।

समस्तभेदसहिताः कालिकायाः प्रकीर्त्तिताः ।

द्वाविंशत्यक्षरी तासां दक्षिणाम्नायकीर्त्तिता ।।

एकजटा षडाम्नाये महामोक्षप्रदायिनी ।

तत्परा परमा विद्या न विद्यान्तरगोपिता ।।

परप्रसादमन्त्रश्च ऊर्द्ध्वाम्नाये प्रकीर्त्तितः ।

वागीश्वरादयो देवा अध आम्नायकीर्त्तिताः ।।

ऊर्द्ध्वाम्नायो अधश्चैव केवलं मोक्षदो भवेत् ।

धर्म्मार्थकाममोक्षार्थे आम्नायान्ये प्रकीर्त्तिताः।।

यथोक्तविधिना भद्रे कृत्वा फलमवाप्नुयात्।।

पूर्व्वाम्नायादिसर्व्वासां विधानं शृणु सुन्दरि।

कृत्वा येनाशु लभते फलं यदुक्तमोत्तमम्।।

षट्कर्मफलदा नॄणां षडाम्नायाः प्रकीर्तिताः। 

उत्तराम्नायो देवेशि तेषामाशु फलप्रदः ।।'

इति समयाचारतन्त्रे २ पटलः ।।।।

तत्र आम्नायभेदेनाचारभेद उक्तः । यथा-

''पूर्व्वाम्नायोदितं कर्म्म पाशवं कथितं प्रिये ।

यदुक्तं दक्षिणाम्नाये तदैव पाशवं स्मृतम् ।।

पश्चिमाम्नायजं कर्म्म पशुवीरसमाश्रितम् ।

उत्तराम्नायजं कर्म्म दिव्यवीराश्रितं प्रिये ।।

दिव्योऽपि वीरभावेन साधयेत् पितृकानने ।

वीरासनं विना दिव्यः पूजयेत् पितृकानने ।

ऊर्द्ध्वाम्नायोदितं कर्म्म दिव्यभावाश्रितं प्रिये ।।

इति निरुत्तरतन्त्रे १ पटलः ।।- शब्दकल्पद्रुमः

 

Vishnu Shatpadi Sanskrit Lyrics (Text)

Vishnu Shatpadi Sanskrit Script

 

रचन: आदि शङ्कराचार्य

 

अविनयमपनय विष्णो दमय मनः शमय विषयमृगतृष्णाम् ।

भूतदयां विस्तारय तारय संसारसागरतः ॥ १ ॥

 दिव्यधुनीमकरन्दे परिमलपरिभोगसच्चिदानन्दे ।

श्रीपतिपदारविन्दे भवभयखेदच्छिदे वन्दे ॥ २ ॥

 सत्यपि भेदापगमे नाथ तवा‌हं न मामकीनस्त्वम् ।

सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥ ३ ॥

 उद्धृतनग नगभिदनुज दनुजकुलामित्र मित्रशशिदृष्टे ।

दृष्टे भवति प्रभवति न भवति किं भवतिरस्कारः ॥ ४ ॥

 मत्स्यादिभिरवतारैरवतारवता‌वता सदा वसुधाम् ।

परमेश्वर परिपाल्यो भवता भवतापभीतो‌हम् ॥ ५ ॥

 दामोदर गुणमन्दिर सुन्दरवदनारविन्द गोविन्द ।

भवजलधिमथनमन्दर परमं दरमपनय त्वं मे ॥ ६ ॥

नारायण करुणामय शरणं करवाणि तावकौ चरणौ ।

इति षट्पदी मदीये वदनसरोजे सदा वसतु ॥