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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(Shamku - Shtheevana)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

 

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Shamku -  Shankushiraa  ( words like Shakata/chariot, Shakuna/omens, Shakuni, Shakuntalaa, Shakti/power, Shakra, Shankara, Shanku, Shankukarna etc. )

Shankha - Shataakshi (Shankha, Shankhachooda, Shachi, Shanda, Shatadhanvaa, Shatarudriya etc.)

Shataananda - Shami (Shataananda, Shataaneeka, Shatru / enemy, Shatrughna, Shani / Saturn, Shantanu, Shabara, Shabari, Shama, Shami etc.)

Shameeka - Shareera ( Shameeka, Shambara, Shambhu, Shayana / sleeping, Shara, Sharada / winter, Sharabha, Shareera / body etc.)

Sharkaraa - Shaaka   (Sharkaraa / sugar, Sharmishthaa, Sharyaati, Shalya, Shava, Shasha, Shaaka etc.)

Shaakataayana - Shaalagraama (Shaakambhari, Shaakalya, Shaandili, Shaandilya, Shaanti / peace, Shaaradaa, Shaardoola, Shaalagraama etc.)

Shaalaa - Shilaa  (Shaalaa, Shaaligraama, Shaalmali, Shaalva, Shikhandi, Shipraa, Shibi, Shilaa / rock etc)

Shilaada - Shiva  ( Shilpa, Shiva etc. )

Shivagana - Shuka (  Shivaraatri, Shivasharmaa, Shivaa, Shishupaala, Shishumaara, Shishya/desciple, Sheela, Shuka / parrot etc.)

Shukee - Shunahsakha  (  Shukra/venus, Shukla, Shuchi, Shuddhi, Shunah / dog, Shunahshepa etc.)

Shubha - Shrigaala ( Shubha / holy, Shumbha, Shuukara, Shoodra / Shuudra, Shuunya / Shoonya, Shoora, Shoorasena, Shuurpa, Shuurpanakhaa, Shuula, Shrigaala / jackal etc. )

Shrinkhali - Shmashaana ( Shringa / horn, Shringaar, Shringi, Shesha, Shaibyaa, Shaila / mountain, Shona, Shobhaa / beauty, Shaucha, Shmashaana etc. )

Shmashru - Shraanta  (Shyaamalaa, Shyena / hawk, Shraddhaa, Shravana, Shraaddha etc. )

Shraavana - Shrutaayudha  (Shraavana, Shree, Shreedaamaa, Shreedhara, Shreenivaasa, Shreemati, Shrutadeva etc.)

Shrutaartha - Shadaja (Shruti, Shwaana / dog, Shweta / white, Shwetadweepa etc.)

Shadaanana - Shtheevana (Shadaanana, Shadgarbha, Shashthi, Shodasha, Shodashi etc.)

 

 

In puraanic literature, Shachi appears as the consort of Lord Indra. She has been depicted as a model wife faithful to her husband. Not much can be drawn from the few stories available in puraanas about Shachi. One has to depend on vedic mantras what the word Shachi may mean. The only hint puraanic stories  provide about Shachi is that this state appears during the ecstasy. She is said to be the daughter of asura Pulomaa. Pulomaa may signify ecstasy. Similarly, demon Namuchi, who is controlled by Indra may also signify ecstasy. One can come out of this state only when this state of ecstasy takes a solid form in the form of our inner speech, Shachi. One can use this inner speech for some gains. What these gains may be, it is indicated by vedic mantras. For example, the state of tranquility(shunam) will be attained by Shachi. When wine and soma are mixed together, some gods have been stated to drink wine out of this with their shachi powers , so that pure soma may be available for lord Indra. Indra is able to separate earth and heaven with his shachi powers, just like the axis and the wheel. Earlier, in spirituality,  these two remain coinciding.  Lord Ashwins have been stated to convert old Chyavana into young with their shachi powers. Indra can change the sequence of cause and effect with his shachi powers. Indra makes the dawn(ushaa) reversible with his shachi powers. He eliminates all enemies from this earth with his shachi powers, so that this mother earth can provide milk for us. The treatment which Ashwin gods do to remove death, they do it with their shachi powers.

          It has been stated in vedic mantras that the path of slow progress, called Rayi, dries up when shachi power develops. Nahusha, who unsuccessfully tries to make Shachi his consort, seems to represent the process of slow progress.

          The stage next to Shachi seems to be Shuchi. Just like Shachi is the consort of lord Indra, Shuchi has been stated to be consort of lord Hari.

First published : 19-6-2010 AD( Jyeshtha shukla ashtami, Vikrami samvat 2067)

शची

टिप्पणी : वैदिक निघण्टु में शची शब्द का वर्गीकरण वाङ् नामानि, कर्म नामानि और प्रज्ञा नामानि के अन्तर्गत किया गया है ।  डा. गोपालकृष्ण एन. भट्ट द्वारा अपने शोध प्रबन्ध Vedic Nighantu ( Mangalore University, १९९२?)  में पृष्ठ ९४ पर दी गई सूचना के अनुसार ऋग्वेद में शची शब्द अपने अन्य रूपों सहित ८६ बार प्रकट हुआ है । इनमें से ५४ स्थानों पर सायणाचार्य द्वारा इसकी व्याख्या कर्मनाम के रूप में और १८ स्थानों पर प्रज्ञा रूप में की गई है । कहीं भी इसकी व्याख्या वाङ् नामानि के रूप में नहीं की गई है । ऋग्वेद १.१.१०६ में शचीपितम् की व्याख्या सायणाचार्य द्वारा कर्मणां पालयिता शचीपति, अर्थात् इन्द्र की गई है । शचीपते शब्द ऋग्वेद में १० बार प्रकट हुआ है और सायणाचार्य द्वारा इसकी व्याख्या कर्मपालकेन्द्र के रूप में की गई है । डा. भट्ट के अनुसार शची के जो रूप ऋग्वेद में प्रकट हुए हैं, वे इस प्रकार हैं शचीनाम् शचीनाम्, शचीभिः, शची  पतिः शचीपतिम्, शचीपती इति शचीऽऽपती, शचीऽपते, शच्यो, शच्याम् शचीऽवः शचीऽवतः, शचीऽवान्, शचीवसूऽइति शचीऽवसू, शचीवसोऽइति शचीऽवसो ।

     ऋग्वेद में जब शची शब्द एकवचन में प्रकट होता है, तब शची का सम्बन्ध इन्द्र से होता है । लेकिन जब शची शब्द बहुवचन में, जैसे शचीभिः प्रकट होता है, तब वह इन्द्र के अतिरिक्त अश्विनौ या अग्नि से भी सम्बन्धित हो सकता है । शची शब्द को समझने के लिए काशकृत्स्न धातु कोश में शच धातु का उपयोग किया जा सकता है । शच धातु को व्यक्तायां वाचि अर्थ में कहा गया है । इसका अर्थ हुआ कि जो वाक् पककर वैखरी वाणी बन गई है, वह शची है । पुराणों में शची द्वारा नहुष को सप्तर्षियों की पालकी आरूढ होने का निमन्त्रण दिया जाता है । यदि ऐसा हो जाए, तभी शची नहुष की भार्या बन सकती है । जैसा कि अन्यत्र टिप्पणियों में भी उल्लेख किया जा चुका है, वैदिक साहित्य में २ आंख, २ कान, मुख, नासिका आदि को सात ऋषि कहा गया है । इसका तात्पर्य यह होगा कि इन विकसित ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अतीन्द्रिय दर्शन करना है, वही ऋषि कहलाने योग्य होंगी । और यह स्वाभाविक है कि जब ऐसी स्थिति होगी तो अव्यक्त वाक् स्वयं ही व्यक्त वाक्, शची बन जाएगी ।

     इन्द्र पत्नी के लिए अन्य नाम इन्द्राणी है जिसके लिए इन्द्राणी शब्द पर टिप्पणी द्रष्टव्य है । जो तथ्य इन्द्राणी के लिए स्पष्ट हुए हैं, वही शची के लिए भी हैं । इन्द्राणी के संदर्भ में महाशनि असुर का आख्यान है जिसका वध वृषाकपि ने किया । वृषाकपि इन्द्र का प्रिय शिष्य/पुत्र बन जाता है।  शांखायन श्रौत सूत्र ४.१६.५, तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.७.१४.४, आपस्तम्ब श्रौत सूत्र २१.३.१३ आदि में मृतक के द्वादशाह कर्म के अन्तर्गत व्रत के अपवर्जन के पश्चात् परिधि कर्म का कथन है । इस कृत्य में गार्हपत्य अग्नि में निम्नलिखित यजु द्वारा होम किया जाता है

अपैतु मृत्युरमृतं न आगन् । वैवस्वतो नो अभयं कृणोतु । पर्णं वनस्पतेरिव । अभि नः शीयताँ रयिः । सचतां नः शचीपतिः ।।

इस यजु के भाष्य में कहा गया है कि जैसे वनस्पति के पर्ण सूखकर अपने आप गिर जाते हैं, वैसे ही रयि हमारे लिए आए या गिरे । शचीपति इन्द्र हमारा सेवन करें । इस यजु का यह भाष्य संदेहास्पद है, इस दृष्टि से कि जब हमारी रयि वनस्पति के पर्ण की भांति सूखकर गिर जाएगी, तब शचीपति इन्द्र हमें प्राप्त होंगे, अथवा रयि और शचीपति इन्द्र दोनों एकसाथ प्राप्त होंगे । जैसा कि उपनिषदों का कथन है, प्राण और रयि दो मार्ग हैं । एक देवयान मार्ग है, एक पितृयान मार्ग । रयि पितृयान मार्ग, धीमी गति से प्रगति करने का मार्ग है । अतः अधिक संभावना यही है कि यह यजु कह रही है कि धीमी गति से प्रगति करने वाला रयि मार्ग हमसे दूर हो और तीव्र गति से प्रगति करने वाला शची मार्ग हमें प्राप्त हो ।

श्रौत ग्रन्थों जैसे शांखायन श्रौत सूत्र १२,४,१९ में माध्यन्दिन सवन में ब्राह्मणाच्छंसी ऋत्विज के स्तोत्रियानुरूपौ का उल्लेख है

श्रायन्त इव सूर्यं शग्ध्यू षु शचीपत इति स्तोत्रियानुरूपौ ।

शांखायन श्रौत सूत्र १६.२१.२९ में इसी यजु का विनियोग अच्छावाक् ऋत्विज के लिए है ।

शांखायन श्रौत सूत्र ८.२०.१ के अनुसार

ऋभवो देवाः सोमस्य मत्सन् । -----शच्या शचिष्ठाः ।

इस यजु में शची शब्द एकवचन में है ।

     आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १९.२.१९ में सौत्रामणि याग के संदर्भ में निम्नलिखित यजु का उल्लेख है

युवं सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा । विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम् ।।

पुत्रमिव पितरावश्विनोभेन्द्रावतं कर्मणा दंसनाभिः। यत्सुरामं व्यपिबः शचीभिः सरस्वती त्वा मघवन्नभीष्णादिति (ऋग्वेद १०.१३१.४-५) सर्वदेवत्ये याज्यानुवाक्ये भवतः ।

इसका अर्थ इस प्रकार किया जा सकता है कि सोम और सुरा परस्पर मिले हुए हैं । अश्विनौ देवों ने नमुचि असुर के साथ मिलकर सुराम(सुरा आम या कच्ची) का पान कर लिया । इससे इन्द्र के लिए शुद्ध सोम उपलब्ध हो गया ।

तैत्तिरीय ब्राह्मण १.७.१.६ में राजसूय के अन्तर्गत शुनासीर याग के संदर्भ में उल्लेख है कि इन्द्र ने वृत्र को मार दिया, असुरों का पराभव कर दिया लेकिन नमुचि असुर को नहीं मार पाया । उसे शची के द्वारा ग्रहण किया । उन दोनों ने एक दूसरे को प्राप्त किया ( तौ समलभेताम् ) । इससे वह शुनतर हो गया (सो अस्मादभिशुनतरो अभवत् ) ।  इसके पश्चात् वर्णन आता है कि इन्द्र ने नमुचि से संधि कर ली कि न शुष्क द्वारा, न आर्द्र द्वारा, न दिन में न रात में तुम्हें मारूंगा । लेकिन फिर इन्द्र ने फेन द्वारा उसका वध कर दिया जो न आर्द्र है, न शुष्क है । इन आख्यानों में नमुचि भक्ति मार्ग में हर्ष की कोई स्थिति हो सकती है जो समाप्त होने का नाम नहीं लेती । यह सुरामं की, सुरा की स्थिति है ।  शुनासीर याग में शुनम्, शून्य स्थिति प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि ऐसी अवस्था समाप्त हो । यह शची द्वारा सम्भव हो पाया । आर्द्र और शुष्क को भी दो प्रकार के तपों के रूप में लिया जा सकता है, जैसा कि उत्तंक शब्द की टिप्पणी में कहा गया है ।

     यदि शची शब्द त्वरित गति वाली साधना को इंगित करता है, तो यह ध्यान देने योग्य है कि वैदिक साहित्य में शची, शचीभिः इत्यादि रूप किस हेतु प्रयुक्त हुए हैं । ऋग्वेद १०.८९.४ के अनुसार

इन्द्राय गिरो अनिशितसर्गा अपः प्रेरयं सगरस्य बुध्नात् ।

यो अक्षेणेव चक्रिया शचीभिर्विष्वक् तस्तम्भ पृथिवीमुत द्याम् ।।

इसका अर्थ यह किया जा सकता है कि इन्द्र ने अपनी शचियों से पृथिवी और द्युलोक को इस प्रकार स्थापित कर दिया जैसे अक्ष में चक्र स्थापित रहता है । कहा जाता है कि पहले द्यौ और पृथिवी परस्पर मिले हुए थे । ऋग्वेद १.३०.१५ में इन्द्र द्वारा शचियों द्वारा अक्ष को चलायमान बनाने का उल्लेख है

आ घ त्वावान् त्मनाप्तः स्तोतृभ्यो धृष्णवियानः । ऋणोरक्षं न चक्र्योः ।।

आ यद् दुवः शतक्रतवा कामं जरितॄणाम् । ऋणोरक्षं न शचीभिः ।।

     ऋग्वेद १.११७.१३ में अश्विनौ द्वारा शचियों द्वारा च्यवन को पुनः युवा बनाने का उल्लेख है

युवं च्यवानमश्विना जरन्तं पुनर्युवानं चक्रथुः शचीभिः ।

यह संकेत करता है कि जरण में शरीर की प्रक्रियाएं धीमी गति वाली हो जाती हैं जिन्हें तीव्र गति वाली बनाने की आवश्यकता पडती है ।

     ऋग्वेद १.१३९.५ के अनुसार(तुलनीय अथर्ववेद २०.८.२)

शचीभिर्नः शचीवसू दिवा नक्तं दशस्यतम् ।

मा वां रातिरुप दसत्कदा चनास्मद्रातिः कदा चन ।।

इस ऋक् के सायण भाष्य के अनुसार हे अश्विनौ, हमें रात दिन अपनी शचियों द्वारा अभिमत दो, जो हम चाहते हैं, वह दो । दशस्यतम् का अर्थ है अभिमत दो । हे अश्विनौ, तुम्हारी राति या दान कभी भी उपदसत्, उपक्षीण न हो, चाहे यागकाल हो या अयागकाल । केवल तुम्हारी राति ही नहीं, हमारी भी राति कभी उपदसत्, उपक्षीण न हो । इस ऋचा का दूसरा अर्थ इस दृष्टिकोण से किया जा सकता है कि दश शब्द ऋग्वेद द्वारा पूर्णता प्राप्ति का सूचक है, शत यजुर्वेद द्वारा और सहस्र सामवेद द्वारा । महाभारत आदि में नल के संदर्भ में कथा आती है कि कर्कोटक नाग ने नल से कहा कि १ से १० तक गिनती गिनो । जैसे ही नल ने १० कहा, कर्कोटक ने उसे डस लिया । इससे नल का रंग काला पड गया । यह पापों के नाश का सूचक है ।  इस ऋचा में अश्विनौ से प्रार्थना की जा रही है कि रात दिन शचियों द्वारा दशन् प्रक्रिया चलती रहे । जो धीमी प्रक्रिया वाली राति है, उसके द्वारा कभी भी उपदशन् न हो । डा. फतहसिंह के अनुसार राति, रायः और रयि, यह तीन धन नामानि में आते हैं लेकिन यह तीन चेतना के अलग अलग स्तरों पर धन के सूचक हैं । रयि का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है जिसके वनस्पति के पर्ण की भांति सूखने की प्रार्थना की गई है ।

     ऋग्वेद १.१६४.४४ के अनुसार

त्रयः केशिन ऋतुथा वि चक्षते संवत्सरे वपत एक एषाम् ।

विश्वमेको अभि चष्टे शचीभिर्ध्राजिरेकस्य ददृशे न रूपम् ।।

इस ऋचा के सायण भाष्य के अनुसार इस विश्व में तीन केशी अग्नि, वायु और आदित्य हैं । इनमें से अग्नि अपने दाह द्वारा पृथिवी पर नापित कर्म की भांति वपन करता है । आदित्य विश्व को शचियों द्वारा देखता है और वायु की ध्राजि अर्थात् गति का आभास होता है, लेकिन रूप दिखाई नहीं पडता ।

     ऋग्वेद ६.४४.९ के अऩुसार

द्युमत्तमं दक्षं धेह्यस्मे सेधा जनानां पूर्वीररातीः।

वर्षीयो वयः कृणुहि शचीभिर्धनस्य सातावस्माँ अविड्ढि ।।

वर्षीय वयः क्या होता है जिसे शचियों द्वारा किया जा सकता है, यह अन्वेषणीय है ।

     ऋग्वेद ६.४७.१५ ऋचा की दूसरी पंक्ति निम्नलिखित है

पादाविव प्रहरन्नन्यमन्यं कृणोति पूर्वमपरं शचीभिः ।।

इस ऋचा का सायण भाष्य इस प्रकार किया गया है कि इन्द्र इतना उग्र है कि वह अपनी शचियों या अपनी प्रज्ञाओं द्वारा प्रथम स्तोता को अन्य और अन्य स्तोता को प्रथम बना देता है, वैसे ही जैसे चलते समय पैर आगे बढाते हैं तो पहला पैर दूसरा हो जाता है । इसका दूसरा अर्थ कारण कार्य के आधार पर किया जा सकता है । यह सर्वविदित है कि इस विश्व में कारण पहले होता है, कार्य बाद में । लेकिन इन्द्र अपनी शचियों के द्वारा कारण और कार्य के क्रम को उलट भी सकता है, जो भौतिक जगत में  असंभव सा माना जाता है, क्योंकि समय का तीर भविष्य की ओर ही जाता है, अतीत की ओर नहीं ।

     ऋग्वेद ७.६.४ ऋचा की प्रथम पंक्ति निम्नलिखित है

यो अपाचीने तमसि मदन्तीः प्राचीश्चकार नृतमः शचीभिः ।

इस ऋचा का सायण भाष्य इस प्रकार किया गया है कि जो प्रजा अपाचीन अर्थात् अप्रकाशमान तम में निमग्न मदन्ती अर्थात् स्तुति करती हुई प्रजा है, इन्द्र अपनी शचियों द्वारा उसको प्राची अर्थात् ऋजुगामिनी बना देता है । अथवा जो अग्नि अपाचीने तमसि अर्थात् रात्रि में मादन करने वाली है, उसे इन्द्र अपनी शचियों द्वारा प्राची उषाएं बना देता है । प्राची और प्रतीची उषाओं में क्या अन्तर होता है, यह अन्वेषणीय है ।

     ऋग्वेद १०.३९.१३ ऋचा निम्नलिखित है

ता वर्तिर्यातं जयुषा वि पर्वतमपिन्वतं शयवे धेनुमश्विना ।

वृकस्य चिद्वर्तिकामन्तरास्याद्युवं शचीभिर्ग्रसिताममुञ्चतम् ।।

इस ऋचा का सायण भाष्य इस प्रकार किया गया है कि हे अश्विनौ, तुम जयुषा जयशील रथ द्वारा पर्वत की ओर वर्तिः अर्थात् मार्ग में जाते हो । तुमने शयु के लिए धेनु की रचना की । तुमने अपनी शचियों द्वारा वृक के मुख में ग्रसित वर्तिका अर्थात् चटका पक्षी को मुख से बाहर निकाल लिया और मुक्त कर दिया । इस ऋचा में वर्तिका को इस प्रकार समझा जा सकता है कि जिस घटना की नित्यप्रति पुनरावृत्ति होती है, जैसे प्रातःकाल उषाकाल का घटित होना, वह वर्तिका कहलाती है । लेकिन जो उषाकाल आज है, वही उषाकाल कल नहीं रहेगा, वह कल परिवर्तित होकर सामने आएगा । यह काल द्वारा ग्रसन है । यदि इस परिवर्तन को समाप्त किया जा सके तो वह वृक के मुख से वर्तिका को निकालना होगा ।

शचियों के अन्य महत्त्वपूर्ण उल्लेख

अव त्या बृहतीरिषो विश्वश्चन्द्रा अमित्रहन् । शचीभिः शक्र धूनुहीन्द्र विश्वाभिरूतिभिः इत्यादि ऋग्वेद १०.१३४.३

रायो बुध्नः संगमनो वसूनां विश्वा रूपाभि चष्टे शचीभिः । - ऋग्वेद १०.१३९.३

प्रत्यञ्चमर्कमनयञ्छचीभिरादित्स्वधामिषिरां पर्यपश्यन् । - ऋग्वेद १०.१५७.५

 

तैत्तिरीय आरण्यक ३.९. में इन्द्र की भार्या के रूप में सेना नाम आया है । सेना शब्द को श्येना रूप में समझा जा सकता है वह भूमि जो श्येन बनकर स्वर्ग से सोम ला सकती है. जैसा कि गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती आदि छन्दों ने करने का प्रयास किया ।  

 

                पुराणों में शची को पुलोमा असुर की पुत्री कहा गया है । पुलोमा का अर्थ पुलकित लोम लिया जा सकता है । यह भक्ति की कोई आह्लादपूर्ण अवस्था हो सकती है जिसमें वह अपने तन मन की सुध खो देता है । ऐसे भक्त को शची रूपी व्यक्त वाक् प्राप्त हो सकती है, अर्थात् जो आनन्द उसको पागल बनाए हुए था, अब वह धीरे धीरे उसके जीवन में नई दिशाएं प्रदान करने लगता है, उसका मार्गदर्शन करने लगता है । महाभारत में द्रुपद भी ऐसे ही भक्त का चरित्र हो सकता है जो शची वाक् रूपी द्रौपदी या याज्ञसेनी को प्राप्त करता है । डा. फतहसिंह के अनुसार द्रुपद शब्द में द्रु प्रत्यय द्रुत गति का परिचायक है । नहुष के संदर्भ में नहुष शब्द की टिप्पणी में यह कहा जा चुका है कि नहुष शब्द की निरुक्ति न हुष के रूप में की जा सकती है, अर्थात् जो आह्लाद की स्थिति आने पर भी अत्यन्त हर्षित नहीं होता । यह गीता के स्थितप्रज्ञ जैसी स्थिति हो सकती है । लेकिन फिर भी वह शची वाक् को प्राप्त करने में क्यों असफल रहता है, यह अन्वेषणीय है । जैसा कि ऊपर टिप्पणी में कहा जा चुका है, तैत्तिरीय ब्राह्मण १.७.१.६ के अनुसार इन्द्र नमुचि असुर का वध करने में असफल रहा । तब उसने शची द्वारा नमुचि का ग्रहण किया । नमुचि शब्द का अर्थ भी न- मुचि, ऐसा आह्लाद जो कभी समाप्त ही न हो, लिया जा सकता है । इस प्रकार के आह्लाद को भी इन्द्र ने शची द्वारा ग्रहण किया, अर्थात् जो आनन्द का अतिरेक किसी प्रकार से अचेतन मन के स्तर पर था, उसे चेतन मन के स्तर पर उतार लिया गया है । तब इन्द्र को शुनम् स्थिति प्राप्त हुई ।

 

शचियों के अन्य महत्त्वपूर्ण उल्लेख

*अव त्या बृहतीरिषो विश्वश्चन्द्रा अमित्रहन् । शचीभिः शक्र धूनुहीन्द्र विश्वाभिरूतिभिः इत्यादि ऋग्वेद १०.१३४.३

*रायो बुध्नः संगमनो वसूनां विश्वा रूपाभि चष्टे शचीभिः । - ऋग्वेद १०.१३९.३

*प्रत्यञ्चमर्कमनयञ्छचीभिरादित्स्वधामिषिरां पर्यपश्यन् । - ऋग्वेद १०.१५७.५

*पश्वङ्गभूता आग्निक्यः सामिधेन्यः

अमुत्रभूयादध यद्यमस्य बृहस्पते अभिशस्तेरमुञ्चः। प्रत्यौहतामश्विना मृत्युमस्माद् देवानामग्ने भिषजा शचीभिः ।। - तैत्तिरीय संहिता ४.१.७.४

*आहवनीयचयनार्थ भुवः कर्षणम्

निवेशनः संगमनो वसूनां विश्वा रूपाभि चष्टे शचीभिः । -(इति आहवनीयं गार्हपत्यं वोपतिष्ठन्ते)। - तै.सं. ४.२.५.५

*चातुर्मास्येषु वरुणप्रघासे याज्यानुवाक्याः कयानश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा । कया शचिष्ठया वृता ।। - तै.सं. ४.२.११.२

प्रजापति के किस ऊति या रक्षण से यह यज्ञ हमारे लिए चित्र बने । कैसा यज्ञ जो सदा वर्धमान है, सखा है । वह यज्ञ कि शचिष्ठ शक्ति से युक्त है ।

*व्युष्टीष्टकाः एकाष्टका तपसा तप्यमाना जजान गर्भं महिमानमिन्द्रम् । तेन दस्यून् व्यसहन्त देवा हन्ताऽसुराणामभवच्छचीभिः ।। - तै.सं. ४.३.११.३

*इन्द्रतन्वाख्या २२ इष्टकाः  - क्रत्वा शचीपतिः तै.सं. ४.४.८.१

*स्तोत्रं मे विश्वमा याहि शचीभिरन्तर्विश्वासु मानुषीषु दिक्षु शौनकीय अथर्ववेद ५.११.८

*यस्तेङ्कुशो वसुदानो बृहन्निन्द्र हिरण्ययः । तेना जनीयते जायां मह्यँ धेहि शचीपते ।। - शौ.अ. ६.८२.३

*शृणातु ग्रीवाः प्र शृणातूष्णिहा वृत्रस्येव शचीपतिः ।। - शौ. अ. ६.१३४.१

*यदश्नामि बलं कुर्व इत्थं वज्रमा ददे । स्कन्धानमुष्य शातयन् वृत्रस्येव शचीपतिः ।। - शौ. अ. ६.१३५.१

*यस्येदं प्रदिशि यद् विरोचते प्र चानति वि च चष्टे शचीभिः । पुरा देवस्य धर्मणा सहोभिर्विष्णुमगन् वरुणं पूर्वहूतिः ।। - शौ. अथर्ववेद ७.२६.२

*प्राण सूक्त स भूतो भव्यं भविष्यत् पिता पुत्रं न विवेशा शचीभिः ।। - शौ. अथर्ववेद ११.६.२०

*अमित्राणां शचीपतिर्मामीषां मोचि कश्चन ।। - शौ.अ. ११.११.२०

*इन्द्रो यां चक्र आत्मनेऽनमित्रां शचीपतिः । सा नो भूमिर्वि सृजतां माता पुत्राय मे पयः ।। - शौ.अ. १२.१.१०

*असपत्नं पुरस्तात् पश्चान्नोअभयं कृतम् । सविता मा दक्षिणत उत्तरान्मा शचीपतिः । - शौ.अ. १९.१६.१, १९.२७.१४

*भूयानरात्याः शच्याः पितस्त्वमिन्द्रासि विभूः प्रभूरिति त्वोपास्महे वयम् ।। - शौ. अथर्ववेद २०.८.२

*शिक्षेयमस्मै दित्सेयं शचीपते मनीषिणे । यदहं गोपतिः स्याम् ।। - शौ.अ. २०.२७.२

*शग्ध्यू३षु शचीपत इन्द विश्वाभिरूतिभिः । भगं न हि त्वा यशसं वसुविदमनु शूर चरामसि ।। - शौ. अ. २०११८.१

 

शिक्षा और शची

द्युमाँ असि क्रतुमाँ इन्द्र धीरः शिक्षा शचीवस्तव नः शचीभिः ।। - ऋ. १.६२.१२

अशिक्षो यत्र शच्या शचीवो दिवोदासाय सुन्वते सुतक्रे भरद्वाजाय गृणते वसूनि ।। - ऋ. ६.३१.४

मा न इन्द्र पीयत्नवे मा शर्धते परा दाः। शिक्षा शचीवः शचीभिः।। - ऋ. ८.२.१५

पूर्वीरिषो बृह्तीर्जीरदानो शिक्षा शचीवस्तव ता उपष्टुत् .. ऋ. ९.८७.९